अवतार
स्वरूप
अवतार संस्कृत भाषाके शब्द है जेकर अर्थ प्रायः उतरल होवऽ है ।[१]
आध्यात्मिक विशेष अर्थ
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]मुख्य लेख: योगके सात भूमि
पञ्चम भूमि असंसक्ति अवस्था है । ई अवस्थामे योगी समाधिस्थ होवे या ओकरासे उठल होवे, ऊ ब्रह्मभावसे कहियो विचलित न होवै या संसारके दृश्यके देखके विमुग्ध न होवै । एही पक्का योगारूढ़ावस्था है । ई अवस्थामे रहके सब काम कैलो जा सक है आउ नहिओ कैल जा सकऽ है । साधारणतः महायोगीश्वर पुरुष आउ अवतारी पुरुष एही अवस्थामे रहऽ हथिन आउ एही अवस्थामे रहके समस्त जगत लीलाके सम्पादन करऽ हथिन ।[२]
एकरो देखथिन
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]सन्दर्भ
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]- ↑ Monier Monier-Williams (1923). []"संग्रहीत प्रति". Archived from the original on 17 नवंबर 2023. Retrieved 8 सितंबर 2017.
{{cite web}}: Check date values in:|access-date=and|archive-date=(help)CS1 maint: bot: original URL status unknown (link) A Sanskrit-English Dictionary. Oxford University Prehkss. p. 90. - ↑ श्री भूपेद्रनाथ, सान्याल (2005). श्रीमद्भगवद्गीता (प्रथम ed.). भागलपुर बिहार: गुरूधाम प्रकाशन समिति. pp. भाग-१, २००.