काम
कामवासना एक उपासना, साधना है । काम पूर्तिसे दिमागके गन्दगी निकलके जीवन सुधर जा है । काम जीवनके चार पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) मे से एक है ।
प्रत्येक प्राणीके भीतरे रागात्मक प्रवृत्तिके सञ्ज्ञा काम है । वैदिक दर्शनके अनुसार काम सृष्टिके पूर्वमे जे एक अविभक्त तत्व हलै ऊ विश्वरचनाला दु विरोधी भावमे आ गेलै । एकरे भारतीय विश्वासमे ऐसन कहल जा है कि आरम्भमे प्रजापति अकेला हलै । ओकर मन न लगलै । ऊ अपन शरीरके दु भाग कैलकै । ऊ आधा भागसे स्त्री आउ आधा भागसे पुरुष बन गेलै । तखनि ऊ आनन्दके अनुभव कैलकै । स्त्री आउ पुरुषके युग्म सन्ततिला आवश्यक है आउ उनकर पारस्परिक आकर्षणे कामभावके वास्तविक स्वरूप है । प्रकृतिके रचनामे प्रत्येक पुरुषके भीतरे स्त्री आउ प्रत्येक स्त्रीके भीतरे पुरुषके सत्ता है । ऋग्वेदमे ई तथ्यके स्पष्ट स्वीकृति पाएल जा है, जैसन अस्यवामीय सूक्तमे कहल गेलै है—जिनका पुरुष कहल जा है ऊ वस्तुतः स्त्री है; जेकर आँख है ऊ ई रहस्यके देखऽहै; अन्धरा एकरा न समझै । (स्त्रिय: सतीस्तां उ मे पुंस आहु: पश्यदक्षण्वान्न बिचेतदन्ध: । - ऋग्वेद, ३ । १६४ । १६) ।
ई सत्यके अर्वाचीन मनोविज्ञान शास्त्रियो पूरा तरह स्वीकार करऽहथिन । ऊ मानऽहथिन कि प्रत्येक पुरुषके मनमे एक आदर्श सुन्दरी स्त्री बसऽहै जेकरा "अनिमा' कहल जा है आउ प्रत्येक स्त्रीके मनमे एक आदर्श तरुणके निवास होवऽहै जेकरा "अनिमस' कहल जा है । वस्तुतः न केवल भावात्मक जगत् मे किन्तु प्राणात्मक आउ भौतिक संस्थोमे स्त्री आउ पुरुषके ई अन्योन्य प्रतिमा विद्यमान रहऽहै, ऐसन प्रकृतिके रचनाके विधान है । कायिक, प्राणिक आउ मानसिक, तीने व्यक्तित्वके परस्पर संयुक्त धरातल है आउ ई तीनोमे कामके आकर्षण समस्त राग आउ वासनाके प्रबल रूपमे अपन अस्तित्व रखऽहै । अर्वाचीन शरीरशास्त्री एकर व्याख्या ऐसे करऽहथिन कि पुरुषमे स्त्रीलिङ्गी हार्मोन आउ स्त्रीमे पुरुषलिङ्गी हार्मोंन होऽहै । भारतीय कल्पनाके अनुसार एही अर्धनारीश्वर है, अर्थात् प्रत्येक प्राणीमे पुरुष आउ स्त्रीके दुनो अर्ध-अर्ध भावमे सम्मिलित रूपसे विद्यमान है आउ शरीरोके एक कोष ऐसन न जे ई योषा-वृषा-भावसे शून्य होवे । ई कहना उपयुक्त होतै कि प्राणिजगत् के मूल रचना अर्धनारीश्वर सूत्रसे प्रवृत्त होलै आउ जितनो प्राणके मूर्त रूप है सबमे उभयलिङ्गी देवता ओत प्रोत है । एक मूल पक्षके दु भागके कल्पनेके "माता-पिता' कहल जा है । एही सबके नाम द्यावा-पृथिवी आउ अग्नि-सोम है । द्यौ: पिता, पृथिवी मता, एही विश्वमे माता-पिता है । प्रत्येक प्राणीके विकासके जे आकाश या अन्तराल है, ओकरे सहयुक्त इकाई द्यावा पृथिवी ई प्रतीकके द्वारा प्रकट कैल जा है । एकरे जायसी ई प्रकार कहलन हे :
- एकहि बिरवा भए दुइ पाता,
- सरग पिता औ धरती माता ।
द्यावा पृथिवी, माता पिता, योषा वृषा, पुरुषके जे दुर्धर्ष पारस्परिक राग है, ओही काम है । कहल जा है, सृष्टिके मूल प्रजापतिके ईक्षण अर्थात् मन है । विराट् मे केन्द्रके उत्पत्तिए के मन कहल जा है । ई मनके प्रधान लक्षण काम है । प्रत्येक केन्द्रमे मन आउ कामके सत्ता है, एहीसे भारतीय परिभाषामे कामके मनसिज या संकल्पयोनि कहल गेलै हे । मनके जे प्रबुद्ध रूप है ओकरे मन्यु कहल जा है । मन्यु भावके पूर्तिला जाया भाव आवश्यक है । बिना जायाके मन्यु भाव रौद्र या भयंकर हो जा है । एकरे भारतीय आख्यानमे सत्तीमे सतीसे वियुक्त होवे पर शिवके भैरव रूप द्वारा प्रकट कैल गेलै हे । वस्तुतः जाया भावसे असम्पृक्त प्राण विनाशकारी है । अतृप्त प्राण जौन केन्द्रमे रहऽ है ओकर विघटन कर डालऽ है । प्रकृतिके विधानमे स्त्री पुरुषके सम्मिलन सृष्टिला आवश्यक है आउ ऊ सम्मिलनके जौन फलके निष्पति होवऽ है ओकरे कुमार कहल जा है । प्राणके बालक रूपे नया-नया रचनाला आवश्यक है आउ ओकरेमे अमृतत्वके श्रृंखला के बेर-बेर लौटवेवाला कड़ी लौकऽ है । आनन्द कामके स्वरूप है । यदि मानवके भीतरेके आकाश आनन्दसे व्याप्त न होवे त ओकर आयुष्यसूत्र अविच्छन्न हो जाए । पत्नीके रूपमे पति अपन आकाशके ओकरासे परिपूर्ण पा है ।
अर्वाचीन मनोविज्ञानके मौलिक अन्वेषण ई है कि काम सब वासनाके मूलभूत वासना है । एहाँ तक त ई मान्यता समुचित है, किन्तु भारतीय विचारके अनुसार काम रूपके वासना स्वयं ईश्वरके रूप है । ऊ कौनो ऐसन विकृति न है जेकरा हेय मानल जाए ।
ई नियमके अनुसार काम प्रजननला अनिवार्य है आउ ओकर ऊ छन्दोमय मर्यादित रूप अत्यन्त पवित्र है । काम वृत्तिके वीभत्स व्याख्या न त इष्ट है, न कल्याणकारी । मानवीय शरीरमे जौन श्रद्धा, मेधा, क्षुधा, निद्रा, स्मृति आदि अनेक वृत्तिके समावेश है, ओही प्रकार काम वृत्तिओ देवीके एक कला रूपमे एहाँ निवास करऽ है आउ ऊ चेतनाके अभिन्न अंग है ।