कालिदास
| कालिदास | |
|---|---|
कालिदासके मेघदूतं लिखित २०मा शताब्दीके एगो कलाचित्र | |
| पेशा | कवि, नाटककार |
| भाषा | संस्कृत, प्राकृत |
| काल | ल. पहिला शताब्दी ईपू |
| बिधा | संस्कृत नाटक, शास्रीय साहित्य |
| बिषय | महाकाव्य कविता, पुराण |
| उल्लेखनीय कामs | कुमारसम्भवं, अभिज्ञानशाकुन्तलं, रघुवंशम्, मेघदूतं, विक्रमोर्वशीयं, ज्योतिर्विदभरणम् |
कालिदास (संस्कृत: कालिदास) गुप्तकालके संस्कृत भाषाके महान् कवि आउ नाटककार हलन ।[१] ऊ भारतके पौराणिक कथा आउ दर्शनके आधार बनाके रचना कैलन आउ उनकर रचनामे भारतीय जीवन आउ दर्शनके विविध रूप आउ मूल तत्त्व निरूपित है । कालिदास अपन एही सब विशेषताके कारण राष्ट्रके समग्र राष्ट्रिय चेतनाके स्वर देवेवाला कवि मानल जा हथिन आउ कुछ विद्वान उनका राष्ट्रिय कविके स्थान तक दे हथिन ।[२]
अभिज्ञानशाकुन्तलं कालिदासके सबसे प्रसिद्ध रचना है । ई नाटक कुछ ऊ भारतीय साहित्यिक कृतिमे से है जिनकर सबसे पहिले यूरोपीय भाषामे अनुवाद होलै हल । ई पूरा विश्व साहित्यमे अग्रगण्य रचना मानल जा है । मेघदूतं कालिदासके सर्वश्रेष्ठ रचना है जेकरामे कविके कल्पनाशक्ति आउ अभिव्यञ्जनावादभावाभिव्यञ्जना शक्ति अपन सर्वोत्कृष्ट स्तर पर है आउ प्रकृतिके मानवीकरणके अद्भुत रखण्डकाव्यसे खण्डकाव्यमे लौकऽ है ।[३]
कालिदास वैदर्भी रीतिके कवि हथिन आउ तदनुरूप ऊ अपन अलङ्कार युक्त किन्तु सरल आउ मधुर भाषाला विशेष रूपसे जानल जा हथिन ।[४]
उनकर प्रकृति वर्णन अद्वितीय है आउ विशेष रूपसे अपन उपमाला जानल जा हथिन ।[५] साहित्यमे औदार्य गुणके प्रति कालिदासके विशेष प्रेम है आउ ऊ अपन शृङ्गार रस प्रधान साहित्योमे आदर्शवादी परम्परा आउ नैतिक मूल्यके समुचित ध्यान रखलन हे ।
कालिदासके परवर्ती कवि बाणभट्ट उनकर सूक्तिके विशेष रूपसे प्रशंसा कैलन हे ।[६]

कालिदास कौन कालमे होलन आउ ऊ मूलतः कौन स्थानके हलन एकरामे बड़ी विवाद है । चूँकि कालिदास द्वितीय शुङ्ग शासक अग्निमित्रके नायक बनाके मालविकाग्निमित्रं नाटक लिखलन आउ अग्निमित्र १७० ईसापू्र्वमे शासन कैलन हल, अतः कालिदासके समयके एक सीमा निर्धारित हो जा है कि ऊ एकरासे पहिले न होएल हो सकथिन । छठा शताब्दी ईसवीमे बाणभट्ट अपन रचना हर्षचरितं मे कालिदासके उल्लेख कैलन हे आउ एही कालके पुलकेशिन द्वितीयके एहोल अभिलेखमे कालिदासके उल्लेख है अतः ऊ इनकर बादके न हो सकथिन । ई प्रकार कालिदासके प्रथम शताब्दी ईसा पूर्वसे छठा शताब्दी ईसवीके मध्य होएल तय है ।[७] दुर्भाग्यवश ई समय सीमाके भीतरे ऊ कहिया होलन एकरा पर बड़ी मतभेद है । विद्वानमे (१) प्रथम शताब्दी ईसा पूर्वके मत (२) द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्वके मत (३) तृतीय शताब्दी ईसवीके मत (४) चतुर्थ शताब्दी ईसवीके मत (५) पचमा शताब्दी ईसवीके मत, आउ (६) छठा शताब्दी के पूर्वार्द्धके मत प्रचलित हलै । एकरामे जादेतर खण्डित हो गेलै हे या ओकरा माने वाला एक्के दुक्के लोग हथिन । किन्तु मुख्य सङ्घर्ष 'प्रथम शताब्दी ईसा पूर्वके मत आउ 'चतुर्थ शताब्दी ईसवीके मत' मे है ।[८]
प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व का मत
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]परम्पराके अनुसार कालिदास उज्जयिनीके ऊ राजा विक्रमादित्यके समकालीन हथिन जे ईसासे ५७ वर्ष पूर्व विक्रम संवत् चलौलन ।[९] विक्रमोर्वशीयके नायक पुरुरवाके नामके विक्रममे परिवर्तनसे ई तर्कके बल मिलऽ है कि कालिदास उज्जयनीके राजा विक्रमादित्यके राजदरबारी कवि हलन । इनका विक्रमादित्यके नवरत्नमे से एक मानल जा है ।
चतुर्थ शताब्दी ईस्वीके मत
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]प्रो॰ कीथ आउ अन्य इतिहासकार कालिदासके गुप्त शासक चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य आउ उनकर उत्तराधिकारी कुमारगुप्तसे जोड़ऽ हथिन जिनकर शासनकाल चौथा शताब्दीमे हलै ।[१०] ऐसन मानल जा है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्यके उपाधि लेलन आउ उनकर शासनकालके स्वर्णयुग मानल जा है ।
विवाद आउ पक्ष-प्रतिपक्ष
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]- कालिदास शुङ्ग राजाके छोड़के अपन रचनामे अपन आश्रयदाता या कोनो साम्राज्यके उल्लेख न कैलन । सच्चाई त ई है कि ऊ पुरुरवा आउ उर्वशी पर आधारित अपन नाटकके नाम विक्रमोर्वशीयं रखलन । कालिदास कोनो गुप्त शासकके उल्लेख न कैलन । विक्रमादित्य नामके ढेर शासक होइलन । सम्भव है कि कालिदास एकरामे से कोनो एकके दरबारमे कवि रहलन हो । अधिकांश विद्वानके मानना है कि कालिदास शुङ्ग वंशके शासनकालमे हलन जिनकर शासनकाल १०० शताब्दी ईसापू्र्व हलै ।
- अग्निमित्र, जे मालविकाग्निमित्र नाटकके नायक हथिन, कोनो सुविख्यता राजा न हलन, एहीसे कालिदास ओकरा विशिष्टता प्रदान न कैलन । उनकर काल ईसासे दु शताब्दी पूर्वके है आउ विदिशा उनकर राजधानी हलै । कालिदासके द्वारा ई कथाके चुनाव आउ मेघदूतमे एगो प्रसिद्ध राजाके राजधानीके रूपमे उनकर उल्लेखसे ई निष्कर्ष निकलऽ है कि कालिदास अग्निमित्रके समकालीन हलन ।
- ई स्पष्ट है कि कालिदासके उत्कर्ष अग्निमित्रके बाद (१५० ई॰ पू॰) आउ ६३४ ई॰ पूर्व तक रहलै हे, जे कि प्रसिद्ध ऐहोलके शिलालेखके तिथि है, जेकरामे कालिदासके महान कविके रूपमे उल्लेख है । यदि ई मान्यताके स्वीकार कर लेल जाए कि माण्डाके कविता या ४७३ ई॰ के शिलालेखमे कालिदासके लेखनके जानकारीके उल्लेख है, त उनकर काल चौथा शताब्दीके अन्तके बादके न हो सकै ।
- अश्वघोषके बुद्धचरित आउ कालिदासके कृतिमे समानता है । यदि अश्वघोष कालिदासके ऋणी हथिन त कालिदासके काल प्रथम शताब्दी ई॰ से पूर्वके है आउ यदि कालिदास अश्वघोषके ऋणी हथिन त कालिदासके काल ईसाके प्रथम शताब्दीके बाद ठहरतै ।
- हमनी कोनो तिथि स्वीकार करियै, ऊ हमनीके उचित अनुमान भर है आउ एकरासे अधिक कुछो न ।
जन्मस्थान
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]कालिदासके जन्मस्थानोके बारेमे विवाद है । मेघदूतं मे उज्जैनके प्रति उनकर विशेष प्रेमके देखित कुछ लोग उनका उज्जैनके निवासी मानऽ हथिन ।
साहित्यकार एहु सिद्ध करेके प्रयास कैलन हे कि कालिदासके जनम उत्तराखण्डके रूद्रप्रयाग जिलाके कविल्ठा गाँवमे होलै हल । कालिदास एहैँ अपन प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण कैलन आउ एहैँ ऊ मेघदूत, कुमारसम्भव आउ रघुवंश नियन महाकाव्यके रचना कैलन हल । कविल्ठा चारधाम यात्रा मार्गमे गुप्तकाशीमे स्थित है । गुप्तकाशीसे कालीमठ सिद्धपीठ वाला रस्तामे कालीमठ मन्दिरसे चार किलोमीटर आगे कविल्ठा गाँव स्थित है । कविल्ठामे सरकार कालिदासके प्रतिमा स्थापित करके एगो सभागारोके निर्माण करवैलकै हे जने हर साल जून माहमे तीन दिन तक गोष्ठीके आयोजन होवऽ है जेकरामे देशभरके विद्वान भाग ले हथिन ।
कालिदासके प्रवासके कुछ साक्ष्य बिहारके मधुबनी जिलाके उच्चैठोमे भेटऽ हे । कहल जा है विद्योतमा (कालिदासके पत्नी) से शास्त्रार्थमे पराजयके बाद कालिदास एहैँ गुरुकुलमे रुकलनऽ। कालिदासके एहैँ उच्चैठ भगवतीसे ज्ञानके वरदान मिललै आउ ऊ महाज्ञानी बनलन । कुछ विद्वान ई कहऽ हथिन कि महाकवि कालिदासके जनम उच्चैठमे होलै हल आउ तखनि ओकर बादमे ऊ उज्जैन गेलन हल । एहाँ आझो कालिदासके डीह है । एहाँके मट्टीसे लैकनके प्रथम अक्षर लिखेके परम्परा आझो एहाँ प्रचलित है ।
कुछ विद्वान त उनका बङ्गाल आउ ओड़िसोके सिद्ध करेके प्रयत्न कैलन हे । कहऽ हथिन कि कालिदासके श्रीलङ्कामे हत्या कर देल गेलै हल किन्तु विद्वान एकरो कपोल-कल्पित मानऽ हथिन ।[११]
जीवनसाथी
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]कथा आउ किंवदन्तीके अनुसार कालिदास शारीरिक रूपसे बड़ी सुन्दर हलन आउ विक्रमादित्यके दरबारके नवरत्नमे एक हलन । कहल जा है कि प्रारम्भिक जीवनमे कालिदास अनपढ़ आउ मूर्ख हलन ।
कालिदासके बियाह विद्योत्तमा नामके राजकुमारीसे होलै । ऐसन कहल जा है कि विद्योत्तमा प्रतिज्ञा कैलन हल कि जे कोनो उनका शास्त्रार्थमे हरा देतै, ऊ उनके सङ्गे बियाह करतथिन । जखनि विद्योत्तमा शास्त्रार्थमे सब विद्वानके हरा देलन त हारके अपमान समझके कुछ विद्वान बदला लेवेला विद्योत्तमाके बियाह महामूर्ख व्यक्तिके साथे करावेके निश्चय कैलन । चलते चलते उनका एगो वृक्ष लौकलै जेकरा पर एगो व्यक्ति जे डाल पर बैठल हलै ओकरे काटित हलै । ओखनी सोचलन कि एकरासे बड़ मूर्ख त कोनो मिलबे न करतै । ओखनी ओकरा राजकुमारीसे बियाहके प्रलोभन देके नीचे उतारलन आउ कहलन - "मौन धारण कर ले आउ जे हमनी कहबौ बस ओही करिहेँ" । ओखनी स्वाङ्ग भेष बनाके विद्योत्तमाके सामने प्रस्तुत कैलन कि हमनीके गुरु अपनेसे शास्त्रार्थ करेला ऐलन हे किन्तु अखनि मौनव्रती हथिन एहीसे ई हाथके सङ्केतसे उत्तर देथिन । इनकर सङ्केतके बुझके हमनी वाणीमे अपनेके उनकर उत्तर देबै । शास्त्रार्थ प्रारम्भ होलै ।
विद्योत्तमा मौन शब्दावलीमे गूढ़ प्रश्न पूछऽ हलन जेकरा कालिदास अपन बुद्धिसे मौन सङ्केतेसे उत्तर दे दे हलन । प्रथम प्रश्नके रूपमे विद्योत्तमा सङ्केतसे एगो अङ्गुरी देखौलन कि ब्रह्म एक हे । किन्तु कालिदास समझलन कि ई राजकुमारी हमर एखो आँख फोड़ल चाहऽ हे । क्रोधमे ऊ दु अङ्गुरीके सङ्केत ई भावसे कैलन कि तु हमर एक आँख फोड़बे त हम तोर दुनो आँख फोड़ देबौ । किन्तु कपटी सब उनकर सङ्केतके कुछ ई प्रकार समझैलकै कि अपने कहित ह कि ब्रह्म एक है किन्तु हमनीके गुरु कहल चाहऽ रहलथिन हे कि ऊ एक ब्रह्मके सिद्ध करेला दुसर (जगत्) के सहायता लेवेला होवऽ है । अकेला ब्रह्म स्वयंके सिद्ध न कर सकै । राजकुमारी दुसर प्रश्नके रूपमे खुलल हाथ देखौलन कि तत्व पाँच है । त कालिदासके लगलै कि ई थप्पड़ मारेके धमकी दे रहलै हे । ओकर जवाबमे कालिदास घूँसा देखौलन कि तु यदि हमरा गलिया पर थप्पड़ मारबे त हम घूँसा मारके तोर थोथुन बिगाड़ देबौ । कपटी सब समझौलन कि गुरु कहल चाह रहलथिन हे कि भले अपने कह रहलथिन हे कि पाँच तत्व अलगे-अलगे है - पृथ्वी, जल, आकाश, वायु आउ अग्नि । किन्तु ई तत्व प्रथक्-प्रथक् रूपमे कोनो विशिष्ट कार्य सम्पन्न न कर सकै अपितु आपसमे मिलके एक होके उत्तम मनुष्य शरीरके रूप ले ले है जेकि ईश्वरके सर्वश्रेष्ठ कृति है । ई प्रकार प्रश्नोत्तरसे अन्तमे विद्योत्तमा अपन हार स्वीकार कर ले हथिन । फिर शर्तके अनुसार कालिदास आउ विद्योत्तमाके बियाह होवऽ है । बियाहके पश्चात् कालिदास विद्योत्तमाके लेके अपन कुटियामे आ जा हथिन आउ प्रथमे रात्रिके जखनि दुनो एक साथ होवऽ हथिन त ओही समय ऊँटके स्वर सुनाई दे है । विद्योत्तमा संस्कृतमे पूछऽ हथिन "किमेतत्" किन्तु कालिदास संस्कृत जानऽ न हलन एहीसे उनकर मुँहसे निकल गेलै "ऊट्र" । ऊ समय विद्योत्तमाके पता चल जा है कि कालिदास अनपढ़ हथिन । ऊ कालिदासके धिक्कारलन आउ ई कहके घरसे निकाल देलन कि सच्चा विद्वान् बनला बिना घर वापिस न ऐहेँ । कालिदास सच्चा मनसे काली देवीके आराधना कैलन आउ उनकर आशीर्वादसे ऊ ज्ञानी आउ धनवान बन गेलन । ज्ञान प्राप्तिके बाद जकनि ऊ घरे लौटलन त ऊ दरवाजा खटखटाके कहलन - कपाटम् उद्घाट्य सुन्दरि! (दरवाजा खोलऽ, सुन्दरी) । विद्योत्तमा चकित होके कहलन - अस्ति कश्चिद् वाग्विशेषः (कोनो विद्वान लगऽ है) ।
ई प्रकार ई किंवदन्तीके अनुसार कालिदास विद्योत्तमाके अपन पथप्रदर्शक गुरु मानलन आउ उनकर ई वाक्यके ऊ अपन काव्योमे जगह देलन । कुमारसम्भवम् के प्रारम्भ होवऽ है - अस्त्युत्तरस्यां दिशि… से, मेघदूतं के पहिला शब्द है - कश्चित्कान्ता… आउ रघुवंशं के शुरुआत होवऽ है - वागार्थविव… से ।
रचना
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]छोट-बड़ कुल लगभग चालीस रचना है जेकरा अलगे-अलगे विद्वान कालिदास द्वारा रचित सिद्ध करेके प्रयास कैलन हे ।[१२] एकरामे से मात्र साते ऐसन है जे निर्विवाद रूपसे कालिदासकृत मानल जा है - तीन नाटक (रूपक): अभिज्ञानशाकुन्तलं, विक्रमोर्वशीयं आउ मालविकाग्निमित्रम्; दु महाकाव्य: रघुवंशम् आउ कुमारसम्भवम्; आउ दु खण्डकाव्य: मेघदूतम् आउ ऋतुसंहार । एकरोमे ऋतुसंहारके प्रो॰ कीथ सन्देहके साथे कालिदासके रचना स्वीकार करऽ हथिन ।[१३]
नाटक
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]मालविकाग्निमित्रं कालिदासके पहिला रचना है जेकरामे राजा अग्निमित्रके कहानी है । अग्निमित्र एगो निर्वासित नौकरके बेटी मालविकाके चित्रसे प्रेम करे लगऽ है । जखनि अग्निमित्रके पत्नीके ई बातके पता चलऽ है त ऊ मालविकाके जेलमे डलवा दे है । किन्तु संयोगसे मालविका राजकुमारी साबित होवऽ है आउ ओकर प्रेम-सम्बन्धके स्वीकार कर लेल जा है ।
अभिज्ञानशाकुन्तलं कालिदासके दुसर रचना है जे उनकर जगतप्रसिद्धिके कारण बनलै । ई नाटकके अनुवाद अङ्ग्रेजी आउ जर्मनके इलावा दुनियाके अनेक भाषामे होलै हे । एकरामे राजा दुष्यन्तके कहानी है जे वनमे एगो परित्यक्त ऋषि पुत्री शकुन्तला (विश्वामित्र आउ मेनकाके बेटी) से प्रेम करे लगऽ है । दुनो जङ्गलमे गन्धर्व विवाह कर ले हथिन । राजा दुष्यन्त अपन राजधानी लौट आवऽ हथिन । एही बीच ऋषि दुर्वासा शकुन्तलाके शाप दे दे हथिन कि जेकर वियोगमे ऊ ऋषिके अपमान कैलकै ओही ओकरा भूला जैतै । बड़ी क्षमाप्रार्थनाके बाद ऋषि शापके तनी नरम करित कहलन कि राजाके अङ्गूठी उनका लोकतहीँ सब कुछ याद आ जैतै । किन्तु राजधानी जाइत रस्तामे ऊ अङ्गूठी भूला जा है । स्थिति तखनि आउ गम्भीर हो गेलै जखनि शकुन्तलाके पता चललै कि ऊ गर्भवती है । शकुन्तला लाख गिड़गिड़ैलै किन्तु राजा ओकरा चिन्हेसे मना कर देलकै । जखनि एगो मछुआरा ऊ अङ्गूठी देखौलकै त राजाके सब कुछ याद ऐलै आउ राजा शकुन्तलाके अपना लेलकै । शकुन्तला शृङ्गार रससे भरल सुन्दर काव्यके एगो अनुपम नाटक है । कहल जा है काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला (कविताके अनेक रूपमे यदि सबसे सुन्दर नाटक है त नाटकमे सबसे अनुपम शकुन्तला है ।)
विक्रमोर्वशीयं एगो रहस्यसे भरल नाटक है । एकरामे पुरूरवा इन्द्रलोकके अप्सरा उर्वशीसे प्रेम करे लगऽ है । पुरूरवाके प्रेमके देखके उर्वशियो उनकासे प्रेम करे लगऽ है । इन्द्रके सभामे जखनि उर्वशी नृत्य करे जा है त पुरूरवासे प्रेमके कारण ऊ ओहाँ बेस प्रदर्शन न कर पावऽ है । एकरासे इन्द्र गोस्सामे ओकरा शापित करके धरती पर भेज दे हथिन । हालाँकि ओकर प्रेमी यदि ओकरासे होवे वाला पुत्रके देख ले त ऊ फिर स्वर्ग लौट सकतै । विक्रमोर्वशीयम् काव्यगत सौन्दर्य आउ शिल्पसे भरपूर है ।
महाकाव्य
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]कुमारसम्भवम् उनकर महाकाव्यके नाम है । रघुवंशम् मे सम्पूर्ण रघुवंशके राजाके गाथाएँ है त कुमारसम्भवम् मे शिव-पार्वतीके प्रेमकथा आउ कार्तिकेयके जन्मके कहानी है ।
रघुवंशं मे कालिदास रघुकुलके राजाके वर्णन कैलन हे ।
खण्डकाव्य
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]मेघदूतम् एगो गीतिकाव्य है जेकरामे यक्ष द्वारा मेघसे सन्देश ले जाएके प्रार्थना आउ ओकरा दूत बनाके अपन प्रिय भिजुन भेजेके वर्णन है । मेघदूतके दु भाग है - पूर्वमेघ आउ उत्तरमेघ ।
ऋतुसंहार मे सब ऋतुमे प्रकृतिके विभिन्न रूपके विस्तारसे वर्णन कैल गेलै हे ।
अन्य रचना
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]इनकर इलावा ढेर छिटपुट रचनाके श्रेय कालिदासके देल जा है किन्तु विद्वानके मत है कि ई रचना अन्य कवी कालिदासके नामसे कैलन । नाटककार आउ कविके इलावा कालिदास ज्योतिषोके विशेषज्ञ मानल जा हथिन । उत्तरकालामृतम् नामक ज्योतिष पुस्तिकाके रचनाके श्रेय कालिदासके देल जा है । ऐसन मानल जातौ है कि काली देवीके पूजासे उनका ज्योतिषके ज्ञान भेटलै । ई पुस्तिकामे कैल गेल भविष्यवाणी सत्य साबित होलै ।
काव्य सौन्दर्य
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]कालिदासके कविकुलगुरु, कनिष्ठिकाधिष्ठित आउ कविताकामिनीविलास नियन प्रशंसात्मक उपाधि प्रदान कैल गेलै हे जे उनकर काव्यगत विशिष्टतासे अभिभूत होइएके देल गेलै हे । कालिदासके काव्यके विशिष्टताके वर्णन निम्नवत कैल जा सकऽ है:
भाषागत विशिष्टता
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]कालिदास वैदर्भी रीतिके कवि हथिन आउ ऊ प्रसाद गुणसे पूर्ण ललित शब्दयोजनाके प्रयोग कैलन हे । प्रसाद गुणके लक्षण है - "जे गुण मनमे ओइसहीँ व्याप्त हो जाए जैसन सूखल ईन्धनके लकड़ीमे अग्नि सहसा प्रज्वलित हो उठऽ है"[१४] आउ कालिदासके भाषाके एही विशेषता है ।
कालिदासके भाषा मधुर नाद सुन्दरीसे युक्त है आउ समासके अल्पप्रयोग, पदके समुचित स्थान पर निवेश, शब्दालङ्कारके स्वाभाविक प्रयोग इत्यादि गुणके कारण ओकरामे प्रवाह आउ प्राञ्जलता विद्यमान है ।
अलङ्कार योजना
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]कालिदास शब्दालङ्कारके स्वाभाविक प्रयोग कैलन हे आउ उनका उपमा अलङ्कारके प्रयोगमे सिद्धहस्त आउ उनकर उपमाके श्रेष्ठ मानल जा है ।[१५] उदहारणला:
सञ्चारिणी दीपशिखेव रात्रौ यं यं व्यतीयाय पतिंवरा सा ।
नरेन्द्रमार्गाट्ट इव प्रपेदे विवर्णभावं स स भूमिपालः ।।[१६]
अर्थात् स्वयंवरमे बेरी-बेरीसे प्रत्येक राजाके सामने गमन करित इन्दुमती राजाके सामनेसे चलित दीपशिखा नियन लगित हलै जेकरा आगे बढ़ जाए पर राजा सबके मुख विवर्ण (अस्वीकृत कर देल जाएसे अन्धकारमय, मलिन) हो जा हलै ।
अभिव्यञ्जना
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]कालिदासके कविताके प्रमुख विशेषता है कि ऊ चित्रके निर्माणमे सबकुछ न कहुँके अभिव्यञ्जना द्वारा पूरा चित्र खीच दे हथिन । जैसे:
एवं वादिनि देवर्शौ पार्श्वे पितुरधोमुखी ।
लीला कमल पत्राणि गणयामास पार्वती ।।[१७]
अर्थात् देवर्षिके द्वारा ऐसन (पार्वतीके विवाह प्रस्तावके) बात करे पर पिताके समीप बैठल पार्वती माथा झुकाके हाथमे लेले कमलके पङ्खुड़ीके गिनेला शुरू कर देलम ।
कालिदासजीके रचनाके विशेष बात
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]कालिदासजी अपन रचनामे अलङ्कार युक्त, सरल आउ मधुर भाषाके प्रयोग करऽ हलन । अपन रचनामे शृङ्गारो रसके बखूबी वर्णन कैलन हे । कालिदासजी अपन रचनामे ऋतुओके व्याख्या कैलन हे जेकि सराहनीय है । कालिदासजीके साहित्यमे सङ्गीत प्रमुख अङ्ग रहलै । सङ्गीतके माध्यमसे कवि कालिदास अपन रचनामे प्रकाश डाललन । कालिदासजी अपन रचनामे आदर्शवादी परम्परा आउ नैतिक मूल्योके ध्यान रखऽ हलन ।
एकरो देखथिन
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]सन्दर्भ
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]- ↑ राम गोपाल, Kālidāsa: His Art and Culture
Archived २०१४-०७-१९ at the वेबैक मशीन गूगल पुस्तक (अभिगमन तिथि १५.०७.२०१४) । - ↑ हजारी प्रसाद द्विवेदी, राष्ट्रिय कवि कालिदास
Archived २०१४-०७-२० at the वेबैक मशीन, हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रन्थावली, गूगल पुस्तक (अभिगमन तिथि १५.०७.२०१४) । - ↑ रामजी उपाध्याय,
महाकवि कालिदास की कृतियां-----....--!
+ ऋतुसंहार:-ऋतुसंहार कालिदास की प्रथम काव्य कृति है। इतिहासकारों के अनुसार बाल कवि कालिदास ने काव्य कला का आरंभ ऋतुवर्णनपरक इसी लघु काव्य से किया था।-#अश्वनी पान्डेय:
संस्कृत साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास
Archived २०१४-०७-२० at the वेबैक मशीन गूगल पुस्तक (अभिगमन तिथि १५.०७.२०१४) । - ↑ आचार्य दण्डी लिखलन हे कि कालिदास वैदर्भी रीतिके सर्वोच्च प्रतिष्ठाता है -
- लिप्ता मधुद्रवेणासन् यस्य निर्विषया गिरः ।
- तेनेदं वर्त्म वैदर्भ कालिदासेन शोधितम् ॥
- ↑ "उपमा कालिदासस्य, भारवेरर्थगौरवम्..."
- ↑ "निर्गतासु न वा कस्य कालिदासस्य सूक्तिसु । प्रीतिर्मधुर सान्द्रासु... ।।" -- बाणभट्ट, हर्षचरितम् ।
- ↑ उमाशङ्कर शर्मा 'ऋषि', संस्कृत साहित्य का इतिहास, चौखम्भा भारती अकादमी, पृष्ठ 202
- ↑ उमाशङ्कर शर्मा 'ऋषि', संस्कृत साहित्य का इतिहास, चौखम्भा भारती अकादमी, पृष्ठ 202
- ↑ संस्कृत साहित्य सोपान
Archived २०१४-०७-२७ at the वेबैक मशीन गूगल पुस्तक, (अभिगमन तिथि 16.07.2014) - ↑ अच्च्युतानंद घिल्डियाल और गोदावरी घिल्डियाल - कालिदास और उसका मानवीय साहित्य
Archived २०१४-०७-२७ at the वेबैक मशीन गूगल पुस्तक, (अभिगमन तिथि 16.07.2014) - ↑ अच्च्युतानंद घिल्डियाल और गोदावरी घिल्डियाल - कालिदास और उसका मानवीय साहित्य
Archived २०१४-०७-२७ at the वेबैक मशीन गूगल पुस्तक, (अभिगमन तिथि 16.07.2014) - ↑ उमाशंकर शर्मा 'ऋषि', संस्कृत साहित्य का इतिहास, चौखम्भा भारती अकादमी, पृष्ठ १९९
- ↑ ए बी कीथ, संस्कृत साहित्य का इतिहास, चौखम्भा भारती अकादमी, पृष्ठ
- ↑ "चित्तं व्याप्नोति यः क्षिप्रं शुष्केन्धनमिवानलः । स प्रसादः स्मस्तेषु रसेसु रचानासु वा।।"
- ↑ "उपमा कालिदासस्य... ।"
- ↑ रघुवंशम् ६/६७
- ↑ कुमारसम्भवम् ६/८४
बाह्य कड़ी
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]| विकिमीडिया कॉमन्स् पर कालिदास से सम्बन्धित मीडिया हे । |
| विकिसूक्ति पर कालिदास से सम्बन्धित उद्धरण हे । |
- कालिदास: ट्रान्सलेशन ऑफ शकुन्तला एण्ड अदर वर्क्स[मृत कड़ी], लेखक-आर्थर डब्ल्यू रायडर
- कालिदास की रचनाएं गुटेनबर्ग परियोजना पर
- Kālidāsa's Kumārasambhava, cantos I-VIII (Google book By Kālidāsa, Mallinātha, Moreshvar Ramchandra Kāle]
- कालिदास जी की रचनाओं की खास बातें
- कालिदास का साहित्य - englische Vers- und Wort-für-Wort Übersetzung von Rtusamhara, Raghuvamsa 1-6, Kumarasambhavam 1 (im Internet Archive)