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गणना

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गणना या गिनल वस्तुके परिमित समुच्चयके अवयवके खोजेके क्रिया हे । गिनेके पारम्परिक तरीका ई रहलै हे कि कौनो (मानसिक या मौखिक) "गणित्र" (काउण्टर) के समुच्चयके हर तत्त्वला एकसे लगातार बढ़ैते रहल, कौनो न कौनो क्रममे, जखनिकि तखनि तक उन तत्त्वके चिन्हित करैत रहल (या विस्थापित करैत रहल) ताकि ओही तत्त्वसे एकसे जादे बेर भेट न होवे, जखनितक कौनो अचिन्हित तत्त्व न बचे; यदि पहिला वस्तुके बाद गणित्र एक पर स्थापित हल, त अन्तिम वस्तुसे भेटके बाद जे मूल्य आवहे, ऊ तत्त्वके वाञ्छित सङ्ख्या दे हे ।

सम्बन्धित शब्द परिगणना के सन्दर्भ समुच्चयके प्रत्येक तत्त्वके एक सङ्ख्या निर्दिष्ट करके कौनो परिमित (मिश्रित) समुच्चय या अपरिमित समुच्चयके तत्त्वके विशिष्ट रूपसे पहचानेसे हे ।

पुरातात्विक साक्ष्य हे जे सुझाव दे हे कि मनुष्य कमसे कम ५०,००० वर्षसे गिनती करैत हे ।[१] गिनतीके मुख्य रूपसे प्राचीन संस्कृति द्वारा सामाजिक आउ आर्थिक आँकड़ाके ट्रैक रखेला उपयोग कैल जा हल जैसेकि समूहके सदस्यके, शिकारी पशुके, सम्पत्तिके या कर्जके सङ्ख्या (अर्थात् लेखाकर्म) । गिनतीके विकास गणितीय सङ्केतन, सङ्ख्याङ्क पद्धति आउ लेखनके विकासके जन्म देलक ।

गणना विभिन्न प्रकारमे कैल जा सकहे ।

गणना शाब्दिक हो सकहे, अर्थात् हर सङ्ख्याके जोरसे (या मानसिक रूपसे) बोलना ताकि प्रगतिके ट्रैक रखल जा सके । ई अक्सर ऊसभ वस्तुके गिनेला प्रयोग कैल जाहे जे विद्यमान हे, वरन् समयके साथे-साथे ढेर चीजके गिनतीला ।

गणना मिलान चिन्हके रूपोमे हो सकहे, जेकरामे प्रत्येक सङ्ख्याला एक चिन्ह अङ्कित कैल जाहे आउ फिर मिलानके बाद सभ चिन्हके गिनल जाहे । ई उपयोगी साबित होवहे जखनि वस्तुके समयके साथे बेर-बेर गिनेला होवे, जैसेकि पूरा दिनमे कौनो चीज केत्ता बेर भेल होवे । मिलान एकाधारी गणना हे (आधार १); सामान्य गणना आधार १० मे होवहे । कम्प्यूटर शून्य आउ १ के साथ द्वयाधारी गणना करहे (आधार २) ।

गिनती कैल सीखल दुनियाके अधिकांश संस्कृतिमे एक महत्त्वपूर्ण शैक्षिक/विकासात्मक मीलके पत्थर मानल जाहे । गिनती कैल सीखल गणितमे एक बच्चाके पहिला कदम हे, आउ ऊ अनुशासनके सबसे मौलिक विचार हे । हालाँकि ऐमेजोनिया आउ आस्ट्रेलियाई आउटबैकके कुछ संस्कृति गिनती नै करहे,[२][३] आउ उनकर भाषामे सङ्ख्याके शब्द नै हे ।

  1. ↑ An Introduction to the History of Mathematics (6th Edition) by Howard Eves (1990) p.9
  2. ↑ Butterworth, B., Reeve, R., Reynolds, F., & Lloyd, D. (2008). Numerical thought with and without words: Evidence from indigenous Australian children. Proceedings of the National Academy of Sciences, 105(35), 13179–13184.
  3. ↑ Gordon, P. (2004). Numerical cognition without words: Evidence from Amazonia. Science, 306, 496–499.