तीर्थङ्कर
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प्रार्थना |
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मुख्य व्यक्तित्व |
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जैनधर्ममे तीर्थङ्कर (अरिहन्त, जिनेन्द्र) ऊ २४ व्यक्तिला प्रयोग कैल जा है, जे स्वयं तपके माध्यमसे आत्मज्ञान (केवल ज्ञान) प्राप्त कर हथिन । जे संसार सागरसे पार लगावेवाला तीर्थके रचना कर हथिन ऊ तीर्थङ्कर कहला हथिन । तीर्थङ्कर ऊ व्यक्ति हथिन जे पूरा प्रकारसे क्रोध, अभिमान, छल, इच्छा आदि पर विजय प्राप्त कैलन हो । तीर्थङ्करके ई नामसे कहल जा है काहेकि ऊ "तीर्थ" (पायाब), एक जैन समुदायके संस्थापक हथिन, जे "पायाब" के रूपमे "मानव कष्टके नदी" के पार कराव हथिन ।
२४ तीर्थङ्करके नाम
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]जैनधर्ममे वर्णित २४ तीर्थङ्करके नाम निम्नलिखित हैः
समीक्षा
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आत्मज्ञान प्राप्त करेके बाद तीर्थङ्कर दुसराके आत्मकल्याणके पथके उपदेश दे हथिन । जैन सिद्धान्तके निर्माण तीर्थङ्करके धार्मिक शिक्षणसे होलै हे । सब तीर्थङ्करके आन्तरिक ज्ञान सही है आउ हर सम्बन्धमे समान है काहेकि एक तीर्थङ्करके शिक्षा कोनो दुसराके विरोधाभासमे न है । किन्तु ऊ अवधिके मनुष्यके पवित्रता आउ आध्यात्मिक उन्नतिके अनुसार विस्तारके स्तरमे विभिन्नता है । जेतना आध्यात्मिक उन्नति आउ मनके पवित्रता है ओतने विस्तारके आवश्यकता कम है ।[१]
अपन मानव जीवनके अन्त-अवधिमे एक तीर्थङ्कर मुक्ति ('मोक्ष' या 'निर्वाण') के प्राप्त कर हथिन जे अनन्त जन्म आउ मृत्युके चक्रके समाप्त कर है ।
जैनधर्मके अनुसार समयके आदि या अन्त न है । ऊ एगो गाड़ीके चक्काके समान चल है । हमनीके वर्तमान युगके पहिले अनन्त संख्यामे समय चक्र होलै हे आउ ई युगके बादो अनन्त संख्यामे समय चक्र होतै । एक्कैसमा सदीके आरम्भमे हमनी वर्तमान अर्धचक्रके पचमा दौरमे लगभग २,५३०मा वर्षमे ही ।
ब्रह्माण्डके ई भागमे समयके प्रत्येक अर्धचक्रमे चौबीस (प्रत्येक पूरा चक्रमे अड़तालीस) तीर्थङ्कर जनम ले हथिन । वर्तमानमे अवसर्पिणी (अवरोही) अर्धचक्रमे पहिला तीर्थङ्कर ऋषभदेव अरब वर्ष पहिले रहलन आउ तीसरा युगके समाप्ति दने मोक्ष प्राप्ति कैलन । चोबीसमा आउ अन्तिम तीर्थङ्कर महावीर स्वामी (५९९-५२७ ईसा पूर्व) हलन जिनकर अस्तित्व एक ऐतिहासिक तथ्य स्वीकार कर लेल गेलै हे ।
हमनीके भाग वाला ब्रह्माण्डमे अगला तीर्थङ्करके जनम समयके अगला (चढ़ित) अर्धचक्रके तीसरा युगके आरम्भमे, लगभग ८२,५०० वर्षमे होतै ।
जैसे तीर्थङ्कर आत्मज्ञानला हमनीके निर्देशित कर हथिन, जैन मन्दिरमे उनकर मूर्तिके पूजा आत्मज्ञान प्राप्त करेके इच्छुक जैनी द्वारा कैल जा है । तीर्थङ्कर ईश्वर या देवता न हथिन । जैनधर्म एक निर्माताके रूपमे ईश्वरके अस्तित्व पर विश्वास न करै । बल्कि ई मान है कि प्राणी सबके रूपमे देवता, मनुष्यसे श्रेष्ठ है किन्तु तैयो पूरा प्रकारसे प्रबुद्ध न है ।
सबसे मूल जैन मन्त्र, णमोकार मन्त्रमे पञ्च परमेष्ठीमे सर्वप्रथम अरिहन्तके नमस्कार कैल गेलै हे । सिद्ध परमात्मा हथिन किन्तु अरिहन्त भगवान् लोकके परम उपकारक हथिन एहीसे उनका सर्वोत्तम कहल गेलै है । एकमे एके अरिहन्त जनम ले हथिन । जैन आगमके अर्हत् द्वारा भाषित कहल गेलै हे । अरिहन्त केवली आउ सर्वज्ञ होव हथिन । अघातिया कर्मके नाश होवे पर केवल ज्ञान द्वारा ऊ समस्त पदार्थके जान हथिन एहीसे उनका 'केवली' कहल जा है । सर्वज्ञो उनके कहल जा है ।[१]
तीर्थङ्कर नामकर्म
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]जे कर्मके बन्धसे तीर्थङ्कर पदके प्राप्ति होव है, ओकरा नामकर्म कहल जा है । जैन ग्रन्थके अनुसार निम्नलिखित सोलह भावना तीर्थङ्कर नामकर्मके आस्रवके कारण है -
- १. दर्शन विशुद्धि
- २. विनय सम्पत्रता
- ३. शील आउ व्रतमे अनतिचार
- ४. निरन्तर ज्ञानोपयोग
- ५. सवेङ्ग अर्थात् संसारसे भयभीत होएल
- ६-७. शक्तिके अनुसार त्याग आउ तप कैल
- ८. साधुसमाधि
- ९. वैयावृत्ति करना
- १०.- १३. अरिहन्त आचार्य-बहुश्रुत (उपाध्याय) आउ प्रवचन (शास्त्र) के प्रति भक्ति
- १४. आवयशकमे हानि न कैल
- १५. मार्ग प्रभावना
- १६. प्रवचन वात्सल्य
एकरो देखथिन
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]सन्दर्भ
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]- 1 2 Muni Rajendra (1971). Jain Dharma Ki Vyakhya.