नवदुर्गा
| नवदुर्गा | |
|---|---|
| देवनागरी | दुर्गा |
| सम्बन्ध | हिन्दु देवी |
| अस्त्र | त्रिशूल, शङ्ख,तलवार, धनुष-बाण, चक्र, गदा आउ कमल, अभय, अग्नि, परशु, भाला , पाश, वज्र, माला, कमण्डल, रस्सी |
| जीवनसङ्गी | शिव |
| सवारी | बाघ, बैल, शेर, गधा, पुष्प |
नवदुर्गा सनातन धर्ममे भगवती माता दुर्गा जिनका आदिशक्ति जगत जननी जगदम्बो कहल जा है, भगवतीके नौ मुख्य रूप है जिनकर विशेष पूजा आउ साधना नवरात्रिके दौरान आउ ओइसहुँ विशेष रूपसे कैल जा है । ई नव/नौ दुर्गा देवीके पापके विनाशिनी कहल जा है, हर देवीके अलगे अलगे वाहन है, अस्त्र शस्त्र है किन्तु ई सब एके हथिन आउ सब परम भगवती दुर्गे माँजीसे प्रकट होवऽ हथिन ।
दुर्गा सप्तशती ग्रन्थके अन्तर्गत देवी कवच स्तोत्रमे निम्नाङ्कित श्लोकमे नवदुर्गाके नाम क्रमशः देल गेलै हे-
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।।
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च ।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ।। [१]
नौ रूप
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]देवी दुर्गाके नौ रूप होवऽ है जिनका नवदुर्गा कहल जा है ।
शैलपुत्री
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]दुर्गाजी पहिला स्वरूपमे 'शैलपुत्री' के नामसे जानल जा हथिन ।[१] एही नवदुर्गामे प्रथम दुर्गा हथिन । पर्वतराज हिमालयके घर पुत्री रूपमे उत्पन्न होवेके कारण इनकर नाम 'शैलपुत्री' पड़लै ।[२] नवरात्र पूजनमे प्रथम दिवस इनके पूजा आउ उपासना कैल जा है । इनकर वाहन वृषभ है, एहीसे ई देवी वृषारूढ़ाके नामोसे जानल जा है । ई देवी दहिना हाथमे त्रिशूल धारण करके रखले हथिन आउ बामा हाथमे कमल सुशोभित है । एही सतीके नामोसे जानल जा हथिन ।
मन्त्र:
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम् ।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ॥
कहानी
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]एक बेर जखनी सतीके पिता प्रजापति दक्ष यज्ञ कैलन त एकरामे सब देवताके निमन्त्रित कैलन, पर अपन दामाद भगवान् शङ्करके न । सती अपन पिताके यज्ञमे जाएला विकल हो उठलन । शङ्करजी कहलन कि सब देवताके निमन्त्रित कैल गेलै हे, उनका न । ऐसनमे ओहाँ जाएल उचित न है । किन्तु सती सन्तुष्ट न होलन ।
सतीके प्रबल आग्रह देखके शङ्करजी उनका यज्ञमे जाएके अनुमति दे देलन । सती जखनी घरे पहुँचलन त खाली मैये उनका स्नेह देलन । बहिनके बातमे व्यङ्ग्य आउ उपहासके भाव हलै । भगवान् शङ्करोके प्रति तिरस्कारके भाव हलै । दक्षो उनकर प्रति अपमानजनक वचन कहलन । एकरासे सतीके क्लेश पहुँचलै । ऊ अपन पतिके ई अपमान न सह सकलन आउ योगाग्नि द्वारा अपनाके जलाकर भस्म कर लेलन ।
ई अनिष्टसे व्यथित होके भगवान् शङ्करजी अपन केशसे वीरभद्रके उत्पन्न करके दक्ष प्रजापतिके यज्ञ विध्वंश करे हजार गणके साथे भेजलन आउ ऊ यज्ञके विध्वंस कर देलन । एही सती अगला जन्ममे शैलराज हिमालयके पुत्रीके रूपमे जनमलन आउ शैलपुत्री कहलैलन । शैलपुत्री माताके पार्वती माताके नामोसे जानल जा है ।पार्वतीजीके कठोर तपस्याके बाद उनका लोक कल्याणके भावनासे विवाह फिरसे भगवान् शङ्करसे होलै । शैलपुत्री शिवके अर्द्धाङ्गिनी बनलन । ई देवीय कथाके महत्व आउ शक्ति अनन्त है ।
अन्य नाम: सती, पार्वती, वृषारूढ़ा, हेमवती, काली, दुर्गा आउ भवानियो इनके परमेश्वरी देवीके अन्य नाम है ।
ब्रह्मचारिणी
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नवरात्र पर्वके दोसर दिन माँ ब्रह्मचारिणीके पूजा-अर्चना कैल जा है । साधक ई दिन अपन मनके माँके चरणमे लगावऽ हथिन । ब्रह्मके अर्थ है तपस्या आउ चारिणी मे आचरण करे वाली । ई प्रकार ब्रह्मचारिणीके अर्थ होलै तपके आचरण करे वाली ।
भगवान् शङ्करके पति रूपमे प्राप्त करेला घोर तपस्या कैलन हल । ई कठिन तपस्याके कारण ई देवीके तपश्चारिणी अर्थात् ब्रह्मचारिणी नामसे अभिहित कैलन ।
कहऽ हथिन माँ ब्रह्मचारिणी देवीके कृपासे सर्वसिद्धि प्राप्त होवऽ है । दुर्गा पूजाके दोसर दिन देवीके एही स्वरूपके उपासना कैल जा है । ई देवीके कथाके सार ई है कि जीवनके कठिन सङ्घर्षोमे मन विचलित न होवेके चाही ।
मन्त्र:
दधाना करपद्माभ्यामक्षमाला-कमण्डलू ।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा ॥
- ई श्लोकमे अनुत्तमाके अर्थ ' जिनकासे अधिक उत्तम कोई न ' ऐसन होवऽ है । आउ अक्षमाला-कमण्डलू शब्दमे दु वस्तू होवेके कारण कमण्डलु शब्दके द्विवचनके प्रयोग है ।
कहानी
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]पूर्वजन्ममे ई देवी हिमालयके घर पुत्री रूपमे जन्म लेलन हल आउ नारदजीके उपदेशसे भगवान् शङ्करजीके पति रूपमे प्राप्त करेला घोर तपस्या कैलन हल । ई कठिन तपस्याके कारण इनका तपश्चारिणी अर्थात् ब्रह्मचारिणी नामसे अभिहित कैल गेलै । एक हजार वर्ष तक ई खाली फल-फूल खाके बितौलन आउ सौ वर्ष तक खाली जमीन पर रहके शाक पर निर्वाह कैलन ।
कुछ दिन तक कठिन उपवास रखे आउ खुलल आकाशके नीचे वर्षा आउ रौदाके घोर कष्ट सहलन । तीन हजार वर्ष तक टूटल बिल्व पत्र खाए आउ भगवान् शङ्करके आराधना करित रहलन । एकर बाद त ऊ सूखल बिल्व पत्र खैलो छोड़ देलन । ढेर हजार वर्ष तक निर्जल आउ निराहार रहके तपस्या करित रहलन । पत्ताके खाना छोड़ देवेके कारणे इनकर नाम अपर्णा नाम पड़ गेलै ।
कठिन तपस्याके कारण देवीके शरीर एकदम क्षीण हो गेलै । देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सब ब्रह्मचारिणीके तपस्याके अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बतौलन, सराहना कैलन आउ कहलन "हे देवी आज तक कौनो ई प्रकारके कठोर तपस्या न कैलक । ई तोरेसे सम्भव हल । तोर मनोकामना परिपूर्ण होत आउ भगवान् चन्द्रमौलि शिवजी तोरा पति रूपमे प्राप्त होत । अखनी तपस्या छोड़के घर लौट जो । जल्दिए तोर पिता तोरा बोलावे आवित हथुन ।"
चन्द्रघण्टा
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]माँ दुर्गाजीके तीसरा शक्तिके नाम चन्द्रघण्टा है । नवरात्रि उपासनामे तीसरा दिनके पूजाके अत्यधिक महत्व है आउ ई दिन इनके विग्रहके पूजन-आराधन कैल जा है । ई दिन साधकके मन 'मणिपूर' चक्रमे प्रविष्ट होवऽ है ।
ई देवीके कृपासे साधकके अलौकिक वस्तुके दर्शन होवऽ है । दिव्य सुगन्धीके अनुभव होवऽ है आउ ढेर प्रकारके ध्वनि सुनाई देवे लगऽ है ।
देवीके ई स्वरूप परम शान्तिदायक आउ कल्याणकारी मानल गेलै हे । एहीसे कहल जा है कि हमनीके निरन्तर उनकर पवित्र विग्रहके ध्यानमे रखके साधना करेके चाही । उनकर ध्यान हमनीके इहलोक आउ परलोक दुनोला कल्याणकारी आउ सद्गति देवे वाला है । ई देवीके मस्तक पर घण्टाके आकारके आधा चन्द्र है । एहीसे ई देवीके चन्द्रघण्टा कहल गेलै हे । इनकर शरीरके रङ्ग सोनाके समान बड़ी चमकीला है । ई देवीके दस हाथ है । ऊ खडग आउ अन्य अस्त्र-शस्त्रसे विभूषित हथिन ।
सिंह पर सवार ई देवीके मुद्रा युद्धला उद्धत रहेके है । इनकर घण्टा नियन भयानक ध्वनिसे अत्याचारी दानव-दैत्य आउ राक्षस कँपित रहऽ है । नवरात्रिमे तीसरा दिन ई देवीके पूजाके महत्व है । ई देवीके कृपासे साधकके अलौकिक वस्तुके दर्शन होवऽ है । दिव्य सुगन्धीके अनुभव होवऽ है आउ ढेर प्रकारके ध्वनि सुनाई देवे लगऽ है । ई क्षणमे साधकके बड़ी सावधान रहेके चाही ।
ई देवीके आराधनासे साधकमे वीरता आउ निर्भयताके साथे सौम्यता आउ विनम्रताके विकास होवऽ है । एहीसे हमनीके चाही कि मन, वचन आउ कर्मके साथहीं कायाके विहित विधि-विधानके अनुसार परिशुद्ध-पवित्र करके चन्द्रघण्टाके शरणागत होके उनकर उपासना-आराधना करेके चाही । एकरासे सब कष्टसे मुक्त होके सहजे परम पदके अधिकारी बन सकऽ हथिन । ई देवी कल्याणकारी हथिन ।
मन्त्र:
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकेर्युता ।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता ॥
कूष्माण्डा
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]नवरात्र-पूजनके चौथा दिन कूष्माण्डा देवीके स्वरूपेके उपासना कैल जा है । ई दिन साधकके मन 'अनाहत' चक्रमे अवस्थित होवऽ है ।
नवरात्रिमे चौथा दिन देवीके कुष्माण्डाके रूपमे पूजल जा है । अपन मन्द, हल्का हँसीके द्वारा अण्ड मने ब्रह्माण्डके उत्पन्न करेके कारण ई देवीके कुष्माण्डा नामसे अभिहित कैल गेलै हे । जखनी सृष्टि न हलै, चारो दन्ने अन्धारे अन्धार हलै, तखनी ई देवी अपन ईषत् हास्यसे ब्रह्माण्डके रचना कैलन हल । एहीसे इनका सृष्टिके आदिस्वरूपा या आदिशक्ति कहल गेलै हे ।
ई देवीके आठ भुजा है, एहीसे अष्टभुजा कहलैलन । इनकर सात हाथमे क्रमशः कमण्डल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र आउ गदा है । अठमा हाथमे सब सिद्धि आउ निधिके देवे वाला जप माला है । ई देवीके वाहन सिंह है आअ इनका कुम्हड़ेके बलि प्रिय है । संस्कृतमे कुम्हड़ेके कुष्माण्ड कहल जा ह एहीसे ई देवीके नाम कुष्माण्डा है ।
ई देवीके वास सूर्यमण्डलके भीतरे लोकमे है । सूर्यलोकमे रहेके शक्ति क्षमता खाली इनकेमे है । एहीसे इनकर शरीरके कान्ति आउ प्रभा सूरजे नियन दैदीप्यमान है । इनकरे तेजसे दस दिशा आलोकित है । ब्रह्माण्डके सब वस्तु आउ प्राणीमे इनकर तेज व्याप्त है ।
अचञ्चल आउ पवित्र मनसे नवरात्रिके चौथा दिन ई देवीके पूजा-आराधना करेके चाही । एकरासे भक्तके रोग आउ शोकके नाश होवऽ है ताउ ओकरा आयु, यश, बल आउ आरोग्य प्राप्त होवऽ है । ई देवी अत्यल्प सेवा आउ भक्तिएसे प्रसन्न होके आशीर्वाद दे हथिन । सच्चा मनसे पूजा करे वालाके सुगमतासे परम पद प्राप्त होवऽ है ।
विधि-विधानसे पूजा करे पर भक्तके कमे समयमे कृपाके सूक्ष्म भाव अनुभव होवे लगऽ है । ई देवी आधि-व्याधिसे मुक्त करऽ हथिन आउ ओकरा सुख समृद्धि आउ उन्नति प्रदान करऽ हथिन । अन्ततः ई देवीके उपासनामे भक्तके सदैव तत्पर रहेके चाही ।
मन्त्र:
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च ।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदाऽस्तु मे ॥
स्कन्दमाता
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]नवरात्रिके पचमा दिन स्कन्दमाताके उपासनाके दिन होवऽ है । मोक्षके द्वार खोले वाली माता परम सुखदायी हथिन । माँ अपन भक्तके समस्त इच्छाके पूर्ति करऽ हथिन । ई देवीके चार भुजा है । ई दहिना दन्नेके ऊपरे वाला भुजासे स्कन्दके गोदमे पकड़ले हथिन । नीचे वाला भुजामे कमलके पुष्प है । बामा दन्ने ऊपरे वाला भुजामे वरदमुद्रामे है आउ नीचे वाला भुजामे कमल पुष्प है ।
पहाड़ पर रहकर सांसारिक जीवमे नवचेतनाके निर्माण करे वाली स्कन्दमाता । नवरात्रिमे पचमा दिन ई देवीके पूजा-अर्चना कैल जा है । कहल जा है कि इनकर कृपासे मूढ़ो ज्ञानी हो जा है । स्कन्द कुमार कार्तिकेयके माताके कारण इनका स्कन्दमाता नामसे अभिहित कैल गेलै है । इनकर विग्रहमे भगवान् स्कन्द बालरूपमे इनकर गोदीमे विराजित हथिन । ई देवीके चार भुजा है । इनकर वर्ण एकदम शुभ्र है । ई कमलके आसन पर विराजमान रहऽ हथिन । एहीसे इनका पद्मासनो कहल जा है । सिंह इनकर वाहन है ।
शास्त्रामे इनकर पुष्कल महत्व बतावल गेलै हे । इनकर उपासनासे भक्तके सब इच्छा पूरा हो जा है । भक्तके मोक्ष मिलऽ है । सूर्यमण्डलके अधिष्ठात्री देवी होवेके कारण इनका उपासक अलौकिक तेज आउ कान्तिमय हो जा है । अतः मनके एकाग्र रखके आउ पवित्र रखके ई देवीके आराधना करे वाला साधक या भक्तके भवसागर पार करेमे कठिनाई न आवऽ है ।
उनकर पूजासे मोक्षके मार्ग सुलभ होवऽ है । ई देवी विद्वान आउ सेवकके पैदा करे वाली शक्ति है । मने चेतनाके निर्माण कर वाली । कहल जा है कालिदास द्वारा रचित रघुवंशम् महाकाव्य आउ मेघदूत रचना स्कन्देमाताके कृपासे सम्भव होलै ।
मन्त्र:
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया ।
शुभदाऽस्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ॥
कात्यायनी
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]माँ दुर्गाके छठा स्वरूपके नाम कात्यायनी है । ऊ दिन साधकके मन 'आज्ञा' चक्रमे स्थित होवऽ है । योगसाधनामे ई आज्ञा चक्रके अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है ।
नवरात्रिमे छठा दिन माँ कात्यायनीके पूजा कैल जा है ।[३]
मान्यता
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]इनकर उपासना आउ आराधनास भक्तके बड़ सहजतासे अर्थ, धर्म, काम आउ मोक्ष चारो फलके प्राप्ति होवऽ है । ओकर रोग, शोक, सन्ताप आउ भय नष्ट हो जा है । जन्मके समस्त पापो नष्ट हो जा है ।
कात्य गोत्रमे विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन भगवती पराम्बाके उपासना कैलन । कठिन तपस्या कैलन । उनकर इच्छा हलै कि उनका पुत्री प्राप्त होवे । माँ भगवती उनकर घरे पुत्रीके रूपमे जन्म लेलन । एहीसे ई देवी कात्यायनी कहलैलन ।[४] इनका गुण शोधकार्य है । एहीसे ई वैज्ञानिक युगमे कात्यायनीके महत्व सर्वाधिक हो जा है । इनके कृपासे सब कार्य पूरा हो जा है । ई वैद्यनाथ नामक स्थान पर प्रकट होके पूजल गेलन ।
माँ कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हथिन । भगवान् कृष्ण के पति रूपमे पावेला ब्रजके गोपि सब इनके पूजा कैलन हल । ई पूजा कालिन्दी यमुनाके तट पर कैल गेलै हल ।
एहीसे ई ब्रजमण्डलके अधिष्ठात्री देवीके रूपमे प्रतिष्ठित हथिन । इनकर स्वरूप अत्यन्त भव्य आउ दिव्य है । ई स्वर्णके समान चमकीला हथिन आउ भास्वर हथिन । इनकर चार भुजा है । दहिना दन्नेके ऊपरे वाला हाथ अभयमुद्रामे है आउ नीचे वाला हाथ वर मुद्रामे । माँके बामा दन्नेके ऊपरे वाला हाथमे तलवार है आउ नीचे वाला हाथमे कमलके फूल सुशोभित है । इनको वाहन सिंह है ।
इनकर उपासना आउ आराधनासे भक्तके बड़ आसानीसे अर्थ, धर्म, काम आउ मोक्ष चारो फलके प्राप्ति होवऽ है । ओकर रोग, शोक, सन्ताप आउ भय नष्ट हो जा है । जन्मके समस्त पापो नष्ट हो जा है । एहीसे कहल जा है कि ई देवीके उपासना करेसे परम पदके प्राप्ति होवऽ है ।
मन्त्र:
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना ।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानव-घातिनी ॥
कालरात्रि
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]
माँ दुर्गाजीके सतमा शक्ति कालरात्रिके नामसे जानल जा है । दुर्गापूजाके सतमा दिन माँ कालरात्रिके उपासनाके विधान है । ई दिन साधकके मन 'सहस्रार' चक्रमे स्थित रहऽ है । एकराला ब्रह्माण्डके समस्त सिद्धिके द्वार खुले लगऽ है ।
कहल जा है कि कालरात्रिके उपासना करेसे ब्रह्माण्डके सब सिद्धिके द्वार खुले लगऽ है आउ समस्त असुरी शक्ति उनकर नामके उच्चारणेसे भयभीत होके दूर भागे लगऽ है । एहीसे दानव, दैत्य, राक्षस आउ भूत-प्रेत उनकर स्मरणेसे भाग जा है । ई ग्रह बाधोके दूर करऽ हथिन आउ अग्नि, जल, जन्तु, शत्रु आउ रात्रि भय दूर हो जा है । इनकर कृपासे भक्त हर प्रकारके भयसे मुक्त हो जा हथिन ।
नामसे अभिव्यक्त होवऽ है कि माँ दुर्गाके ई सतमा शक्ति कालरात्रिके नामसे जानल जा है अर्थात् जिनकर शरीरके रङ्ग घना अन्धकार नियन एकदम करिया हे । नामेसे जाहिर है कि इनकर रूप भयानक है । सिरके केश बिखरल है आउ गलामे विद्युत नियन चमके वाला माला है । अन्धकारमय स्थितिके विनाश करे वाली शक्ति है कालरात्रि । कालोसे रक्षा करे वाली ई शक्ति है ।
ई देवीके तीन नेत्र है । ई तीनहुँ नेत्र ब्रह्माण्डके समान गोल है । इनकर साँससे अग्नि निकलैत रहऽ है । ई गर्दभके सवारी करऽ हथिन । ऊपरे उठल दहिना हाथके वर मुद्रा भक्तके वर दे है । दहिने दन्नेके नीचे वाला हाथ अभय मुद्रामे है, मने भक्त हमेशा निडर, निर्भय रहथिन ।
बामा दन्नेके ऊपरे वाला हाथमे लोहाके काँटा आउ नीचे वाला हाथमे खड्ग है । इनकर रूप भलहीँ भयङ्कर होवे किन्तु ई सदैव शुभ फल देवे वाली माँ हथिन । एहीसे ई शुभङ्करी कहलैलन । अर्थात् इनकासे भक्तके कौनो प्रकारसे भयभीत या आतङ्कित होवेके आवश्यकता न । उनकर साक्षात्कारसे भक्त पुण्यके भागी बनऽ है ।
मन्त्र:
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता ।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी ॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा ।
वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी ॥
महागौरी
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]माँ दुर्गाजीके अठमा शक्तिके नाम महागौरी है । दुर्गापूजाके अठमा दिन महागौरीके उपासनाके विधान है । नवरात्रिमे अठमा दिन महागौरी शक्तिके पूजा कैल जा है । नामसे प्रकट है कि इनकर रूप पूर्णतः गौर वर्ण है । इनकर उपमा शङ्ख, चन्द्र आउ कुन्दके फूलसे देल है । अष्टवर्षा भवेद् गौरी मने इनकर आयु आठ वर्षके मानल गेलै हे । इनकर सब आभूषण आउ वस्त्र श्वेत है । एहीसे उनका श्वेताम्बरधरा कहल गेलै हे । इनकर चार भुजा है आउ वाहन वृषभ है एहीसे वृषारूढ़ो कहल गेलै हे ।
इनकर ऊपरे वाला दहिना हाथ अभय मुद्रा है आउ नीचे वाला हाथ त्रिशूल धारण कैले है । ऊपरे वाला बामा हाथमे डमरू धारण करके रखलन हथिन आउ नीचे वाला हाथमे वर मुद्रा है । इनकर पूरी मुद्रा बड़ी शान्त है ।
मान्यता
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]पति रूपमे शिवके प्राप्त करेला महागौरी कठोर तपस्या कैलन हल । एही कारणसे इनकर शरीर करिया हो गेलै किन्तु तपस्यासे प्रसन्न होके भगवान् शिव इनकर शरीरके गङ्गाके पवित्र जलसे धोके कान्तिमय बना देलन । उनकर रूप गौर वर्णके हो गेलै । एहीसे ई महागौरी कहलैलन ।[५]
ई अमोघ फलदायिनी हथिन आउ इनकर पूजासे भक्तके समस्त कल्मष धोआ जा है । पूर्वसञ्चित पापो नष्ट हो जा है । महागौरीके पूजन-अर्चन, उपासना-आराधना कल्याणकारी है । इनकर कृपासे अलौकिक सिद्धियो प्राप्त होवऽ है ।
एक आउ मान्यताके अनुसार एक भूखल सिंह भोजनके तलाशमे ओहाँ पहुँचलै जन्ने देवी ऊमा तपस्या करित हलथिन । देवीके देखके सिंहके भूख बढ़ गेलै, किन्तु ऊ देवीके तपस्यासे उठेके प्रतीक्षा करित ओहैँ बैठ गेलै । ई प्रतीक्षामे ऊ बड़ी कमजोड़ हो गेलै । देवी जखनी तपसे उठलन त सिंहके दशा देखके उनका ओकरा पर बड़ी दया आ गेलै । ऊ द्याभाव आउ प्रसन्न्तासे ओकरो अपन वाहन बना लेलन काहेकि ऊ उनकर तपस्या पूरा होवेके प्रतीक्षामे स्वयमो तप करे बैठलै ।[६]
कहल जा है जे स्त्री माँके पूजा भक्तिभाव सहित करऽ हथिन उनकर सुहागके रक्षा देवी स्वयं करऽ हथिन ।[७]
मन्त्र:
श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः ।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेव-प्रमोद-दा ॥
अन्य नाम: ई अन्नपूर्णा, ऐश्वर्य प्रदायिनी, चैतन्यमयियो कहल जा हथिन । महादेव-प्रमोद-दा के अर्थ है महादेवके आनन्द देवे वाली ।
सिद्धिदात्री
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]माँ दुर्गाके नौमा शक्तिके नाम सिद्धिदात्री है । ई सब प्रकारके सिद्धिके देवे वाली हथिन ।[८] नवरात्र के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है।[९] मान्यता है कि ई दिन शास्त्रीय विधि-विधान आउ पूर्ण निष्ठाके साथे साधना करे वाला साधकके सब सिद्धिके प्राप्ति हो जा है । ई देवीके दहिना दन्ने नीचे वाला हाथमे चक्र, ऊपरे वाला हाथमे गदा आउ बामा दन्नेके नीचे वाला हाथमे शङ्ख आउ ऊपरे वाला हाथमे कमलके पुष्प है ।[१०] इनकर वाहन सिंह है आउ ई कमल पुष्पो पर आसीन होवऽ हथिन ।[११] नवरात्रमे ई अन्तिम देवी हथिन । हिमाचलके नन्दापर्वत पर इनकर प्रसिद्ध तीर्थ है ।
मान्यता
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]मानल जा है कि इनकर पूजा करेसे बाकी देवीके उपासनो स्वंय हो जा है ।
ई देवी सर्व सिद्धि प्रदान करे वाली देवी हथिन । उपासक या भक्त पर इनकर कृपासे कठिनसे कठिन कार्यो आसानीसे सम्भव हो जा है । अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व आउ वशित्व आठ सिद्धि होवऽ है । एहीसे ई देवीके सच्चा मनसे विधि विधानसे उपासना-आराधना करेसे ई सब सिद्धि प्राप्त कैल जा सकऽ है ।
कहल जा है भगवान शिवो ई देवीके कृपासे ई समस्त सिद्धि प्राप्त कैलन हल । ई देविएके कृपासे शिवजीके आधा शरीर देवीके होलै हल ।[१२] एही कारण शिव अर्द्धनारीश्वर नामसे प्रसिद्ध होइलथिन ।
ई देवीके दहिना दन्ने नीचे वाला हाथमे चक्र, ऊपरे वाला हाथमे गदा आउ बामा दन्नेके नीचे वाला हाथमे शङ्ख आउ ऊपरे वाला हाथमे कमलके पुष्प है ।[१०]
विधि-विधानसे नौमा दिन ई देवीके उपासना करेसे सिद्धि प्राप्त होवऽ है । इनकर साधना करेसे लौकिक आउ परलौकिक सब प्रकारके कामनाके पूर्ति हो जा है ।[१३] माँके चरणमे शरणागत होके हमनीके निरन्तर नियमनिष्ठ रहके उपासना करेके चाही । ई देवीके स्मरण, ध्यान, पूजन हमनीके ई संसारके असारताके बोध करावऽ है आउ अमृत पद दन्ने ले जा है ।
सिद्धिदात्रीके मन्त्र:
सिद्धगन्धर्व-यक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि ।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ।।
- गन्धर्व + यक्ष + आद्य -> के अर्थ (स्वर्गलोकनिवासी उपदेवता गण, जिनकामे गन्धर्व, यक्ष, इत्यादि आद्य है), आउ असुर (राक्षस), अमर (देव) गणो, ई सबसे जेकर सेवा होवऽ है ।
- सिद्धगन्धर्व-यज्ञज्ञैरसुरैरमरैरपि ई पाठभेदो लोकऽ है । यज्ञज्ञ = ऊ जे यज्ञके विधान आदि जानऽ है ।
सन्दर्भ
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]- ↑ वाराह पुराण, मार्कण्डेय तथा ब्रह्मा संवाद ।
- ↑ "9 days, 9 avatars: How Goddess Shailaputri teaches us patience and strength". Times of India Blog (in American English). 2016-10-01. Archived from the original on 22 जुलाई 2019. Retrieved 2019-10-06.
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बाहरी कड़ी
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]| नवदुर्गा से सम्बन्धित मीडिया विकिमीडिया कॉमन्स पर उपलब्ध हे । |