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विक्रमादित्य

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विक्रमादित्य
चक्रवर्ती सम्राट
विक्रमादित्यके आधुनिक निरूपण
विक्रमादित्यके आधुनिक निरूपण
मालवेन्द्र
ल.५७ ईपू - १९ ई
ल.५७ ईपू
पूर्ववर्तीसम्राट गन्धर्वसेन
जीवनसङ्गीमदनलेखा, चन्द्रवती, कलिङ्गसेना, मदनसुन्दरी, गुनवती
पितागन्धर्वसेन
धर्महिन्दुधर्म

विक्रमादित्य (५७ ईसा पूर्व - १९ ईस्वी) भारतीय सम्राट हलन जिनका 'विक्रमसेन' के नामोसे जानल जा है । उनकर साम्राज्यके राजधानी उज्जैन हलै ।[][]

विक्रमादित्य विक्रम संवत् के प्रवर्तन ५७ ईसापूर्वमे शकके हरावेके बाद कैलन हल । उ उत्तर भारत पर अपन शासन व्यवस्थित कैलन हल । उनकर पराक्रमेके देखके उनका महान् सम्राट कहल गेलै आउ उनकर नामके उपाधि कुल १४ भारतीय राजाके देल गेलै ।

चन्द्रगुप्त द्वितीय या विक्रमादित्यके साम्राज्य अपन अधिकतम विस्तार पर चन्द्रगुप्त द्वितीय द्वारा गुजरात क्षेत्रके शक अथवा पश्चिमी क्षत्रपके पराजित करेके बाद हलै । एकर उपरान्त ई शक संवत् के स्थान पर विक्रम संवत् लागू कैलन हल ।[]
  चन्द्रगुप्त प्रथम
  समुद्रगुप्त
  चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य)

राजा विक्रमादित्य नाम, 'विक्रम' आउ 'आदित्य' के समाससे बनल है जेकर अर्थ 'पराक्रमके सूर्य' या 'सूर्यके समान पराक्रमी' है । उनका विक्रम या विक्रमार्क (विक्रम + अर्क) एहु कहल जा है (संस्कृतमे अर्क के अर्थ सूर्य है) ।

"विक्रमादित्य" के उपाधि भारतीय इतिहासमे बादके ढेर अन्य राजा प्राप्त कैलन हल जिनकामे गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय आउ सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य (जे हेमुके नामसे प्रसिद्ध हलन) उल्लेखनीय हथिन ।

दुसर शताबदी ईपू मे मालवा पर राजा गर्दभिल्लके शासन हलै । भविष्य पुराणके अनुसार गन्धर्वसेनके पिता देवराज इन्द्र हलन । उनकर सेनापतिके नाम वीरभद्र आउ मन्त्रीके नाम विष्णुदत्त हलै । गन्धर्वसेनके पत्नीके नाम वीरमती हलै । उनकर दु पुत्र होइलन भर्तहरी आउ विक्रमसेन । तखनि मालवा एगो स्वतन्त्र राज्य हलै । कुछ वर्ष पश्चात् शकके राजा नहपान मालवा पर आक्रमण करके ओकरा पर अधिकार कर लेलन । युद्धमे उनकर पिता राजा गन्धर्वसेनके मृत्यु हो गेलै । किन्तु मन्त्री विष्णुदत्त, रानी वीरवती आउ दुनो राजकुमार ओहाँसे बचके निकल गेलन । शकके मालवामे बीस वर्ष राज करेके बाद विक्रमसेन शकके हराके मालवाके शकसे मुक्त करौलन । विक्रमसेन धीरे-धीरे शकके भारतसे खदेड़ेला शुरू कैलण । ऊ भारतके ढेर राज्यसे सहयोग माङ्गलन आउ एगो बड़ सेनाके निर्माण कैलन । अन्ततः ऊ शकके हराके विक्रम संवत् के शुरुआत कैलन । कहल जा है कि विक्रमादित्यके दरबारमे नौ रत्नो हलन आउ नौ रत्नके परम्परा सम्राट विक्रमादित्येसे शुरू होलै हल ।

नौ रत्नके नाम -

  1. धन्वन्तरि
  2. क्षापनक
  3. अमरसिम्हा
  4. सङ्कू
  5. वेतालभट्ट
  6. घटकरपारा
  7. कालिदास
  8. वराह मिहिर
  9. वररुचि

कालिदास सम्राट विक्रमादित्यके उल्लेख "ज्योतिर्विदभरणम" के एगो पुस्तकमे कैलन हे । एकर रचना ऊ ३३ ईपू मे कैलन हल । कालिदास महाराज विक्रमादित्यके दरबारमे कवी आउ पण्डितके सूची दे हथिन - १. सङ्कु, २. वररुचि, ३. मणि, ४. अङ्गुदत्त, ५. जिष्णु, ६. त्रिलोचन, ७. हरि, ८. घटकरपारा, ९. अमरसिंह, १०. सत्याचार्य, ११. वराहमिहिर, १२. श्रुतसेन, १३. बादरायण, १४. मनित्थ, १५. कुमार सिम्हा और ज्योतिषी, १६. स्वयं (कालिदास) आउ अन्य (श्लोक २२-८,९)

श्रीकृष्ण मिश्रा अपन पुस्तक ज्योतिषफल-रत्नमाला, ज्योतिष पर एगो पुस्तक (१४ ईस्वी) मे अपन राजाके ई प्रकार श्रद्धाञ्जलि देलन हे - "ऊ विक्रमार्क, सम्राट, मानुसके प्रकार प्रसिद्ध, जे सत्तर वर्ष तक हमर आउ हमर सम्बन्धके रक्षा कैलन, हमरा एक करोड़ सोनाके सिक्का देलन, जे सफलता आउ समृद्धिके साथे हमेशाला फलित-फूलित हथिन । (ज्योतिषफल रत्नमालाके श्लोक १०)

कश्मीरके इतिहास - जखनि कश्मीरके राजाके सूचमें ८२मा राजा, हिरण्यके मृत्यु बिना कोनो उत्तराधिकारीके छोड़ले हल त कश्मीरमे मन्त्रीके मन्त्रिमण्डल अपन अधिपति महाराजा विक्रमादित्यके एगो सन्देश भेजलन आउ उनकासे प्रतिनियुक्ति करेके अनुरोध कैलन । फिर दरबारके एगो विद्वान-कवि, मातृगुप्तके प्रति अपन पक्षमे महाराजा विक्रमादित्य मातृगुप्तके १४ ईस्वीमे अपन जागीरदार राज्य, कश्मीरके सम्प्रभुताके साथे स्थापित कैलन । (कल्हण द्वारा लिखित राजतरङ्गिणी तीसरा तरङ्ग)

मालवाके शासकके सूची
क्रम संख्या शासक
अदबदेव
महामार
देवापी
देवदत्त
मालवा पर मगध साम्राज्यके शासन
नाबोवाहन
गन्धर्वसेन
मालवा पर शकके शासन
विक्रमादित्य
१० देवभक्त

विक्रमादित्यके पौराणिक कथा

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संस्कृतके सर्वाधिक लोकप्रिय दु कथा-श्रृङ्खला है वेताल पञ्चविंशति या बेताल पच्चीसी ("पिशाचके २५ कहानी") आउ सिंहासन-द्वात्रिंशिका ("सिंहासनके ३२ कहानी" जे सिहांसन बत्तीसी के नामोसे विख्यात है) । ई दुनोके संस्कृत आउ क्षेत्रीय भाषामे ढेर रूपान्तरण मिलऽ है ।

पिशाच (बेताल) के कहानीमे बेताल, पच्चीस कहानी सुनावऽ है जेकरामे राजा बेतालके बन्दी बनावेला चाहऽ है आउ ऊ राजाके उलझन पैदा करे वाला कहानी सुनावऽ है आउ उनकर अन्त राजाके समक्ष एगो प्रश्न रखित करऽ है । वस्तुतः पहिले एगो साधु राजासे विनती करऽ है कि ऊ बेतालसे बिन कोनो शब्द बोले ओकरा उनकर पास ले आवथिन, न त बेताल उड़के वापिस अपन जगह चल जैतै । राजा खाली ओही स्थितिमे चुप रह सकऽ हलथिन, जखनि ऊ उत्तर न जानऽ होथिन, अन्यथा राजाके सिर फट जैतै । दुर्भाग्यवश राजाके पता चलऽ है कि ऊ ओकर सब प्रश्नके उत्तर जानऽ हथिन । एहीसे विक्रमादित्यके उलझनमे डाले वाला अन्तिम प्रश्न तक बेतालके पकड़े आउ फिर ओकर छूट जाएके सिलसिला चोबीस बेर चलऽ है । ई सब कहानीके एक रूपान्तरण कथा-सरित्सागरमे देखल जा सकऽ है ।

सिंहासनके खिस्सा विक्रमादित्यके ऊ सिंहासनसे जुड़ल है जे भूला गेलै हल आउ ढेर सदी बाद धारके परमार राजा भोज द्वारा बरामद कैल गेलै हल । स्वयं राजा भोजो ढेर प्रसिद्ध हलन आउ कहानीके ई श्रृङ्खला उनकर सिंहासन पर बैठेके प्रयासके बारेमे है । ई सिंहासनमे ३२ पुतली लगल हलै जे बोल सकऽ हलै आउ राजाके चुनौती दे है कि राजा खाली ओही स्थितिमे सिंहासन पर बैठ सकऽ हथिन यदि ऊ उनकर द्वारा सुनावल जाए वाला कहानीमे विक्रमादित्य नियन उदार हथिन । एकरासे भोजके ३२ प्रयास (आउ ३२ कहानी) सामने आवऽ है आउ हर बार भोज अपन हीनता स्वीकार करऽ हथिन । अन्तमे पुतली उनकर विनम्रतासे प्रसन्न होके उनका सिंहासन पर बैठे दे है । राजा भोजके बाद कोनो ऊ सिंहासन पर न बैठ पैलै । एकर उल्लेख हमनीके उज्जैनके साहित्यमे मिलऽ है ।

भारत आउ नेपालके हिन्दु परम्परामे व्यापक रूपसे प्रयुक्त प्राचीन पञ्चाङ्ग है विक्रम संवत् या विक्रम युग । कहल जा है कि ईसा पूर्व ५६ मे शक पर अपन जीतके बाद राजा एकर शुरूआत कैलन हल ।

  1. कैलास चन्द जैन (1972). Malwa Through the Ages, from the Earliest Times to 1305 A.D. मोतीलाल बनारसीदास. प॰ 160. आई॰ऍस॰बी॰एन॰ 978-81-208-0824-9. | Vikramaditya was a great conqueror. The Kathasaritsāgara describes the victorious camp of Vikramaditya, joined by the king of Śaktikumāra of Gauḍa (Bengal), Jayadhvaja of Karṇāta (Nepal), Vijaya- varman of Lața (Gujarat), Sunandana of Kashmir, Gopala of Sindh, Vindhyaballa of Bhills, etc.
  2. Kathasaritsagara original text by Sri Somadeva Bhatta | https://archive.org/details/KathaSaritSagaraOriginalText/page/n1/mode/1up
  3. https://www.worldhistory.org/image/11428/extent-of-the-gupta-empire-320-550-ce/