सती
| सती | |
|---|---|
| शक्ति, ऊर्जा, वैवाहिक सुख, दीर्घायु, सौन्दर्य, सद्भाव, आकर्षण, युद्ध, शान्ति, रौद्रता, सौम्यता, सुख, प्रकृति, पतिव्रत धर्म, स्त्रीत्व, संस्कार आउ सदाचार की देवी | |
| त्रिदेवी के सदस्य | |
देवी सतीके मृत शरीर पर विलाप करैत हुए भगवान् शङ्कर | |
| अन्यनाम | सती, गौरी, कामाख्या, काली, महाविद्या, तारा, शङ्करी, शाम्भवी |
| सम्बन्ध | देवी, पार्वती का पूर्वजन्म, आदि शक्ति, आदि पराशक्ति, जगदम्बा, दाक्षायणी, शक्ति |
| निवासस्थान | कैलाश आउ शक्तिपीठ |
| मन्त्र | ॐ सर्वसमोहन्ये विद्महे विश्वजनन्ये धीमही तन्नो शक्ति प्रचोद्यात । |
| अस्त्र | त्रिशूल, चक्र, शङ्ख, ढाल, तलवार, धनुष बाण, गदा आउ कमल |
| जीवनसङ्गी | शिव |
| माता-पिता |
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| भाई-बहिन | कद्रू, अदिति, दिति, रोहिणी आउ अन्य बहिन |
| सवारी | नन्दी, शेर |
| समुदाय | गहड़वार क्षत्रियके कुलदेवी (केवल महाराजाधिराज जयचन्दके परिवार के) |
| त्योहार | महाशिवरात्रि, नवरात्रि, दुर्गाष्टमी आउ काली पूजा |


सती माता के जन्म आधुनिक हरिद्वारके पास दक्ष राज्यके राजधानी कनखलमे होलै हल । सती माता भगवान् शिवके पत्नी आउ सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीके पुत्र प्रजापति दक्ष आउ प्रसूतिके पुत्री हलन । माता सतीके गौरी, कामख्या, काली, महाविद्या, तारा, शङ्करी, शाम्भवीके नामोसे जानल जा है ।
माता सतीके कुल ५२ शक्तिपीठ है । माता सतीके यज्ञ कुण्डमे अपन प्राण त्यागेके बाद उनकर मृत शरीरके साथे भगवान् शिवके विलाप करैत देखके उनकर पीड़ाके कम करेला भगवान् विष्णुजी अपन सुदर्शन चक्रसे माता सतीके मृत शरीरके ५२ भाग विभाजित कर देलन । जन्ने जन्ने माता सतीके शरीरके टुकड़ा धरती पर गिरलै ओहाँ शक्तिपीठके निर्माण होलै । माता सतीके शक्तिपीठ भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बाङ्गलादेश, श्रीलङ्का, तिब्बत इत्यादि देशमे आझो मौजूद है ।
पुराणमे वर्णित आरम्भिक जीवन
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]शैव पुराणमे भगवान् शिवके प्रधानताके कारण शिवके परमतत्त्व एवं शक्ति (शिवा) के उनकर अनुगामिनी बतावल गेलै हे । एकरे समानान्तर शाक्त पुराणमे शक्तिके प्रधानता होवेके कारण शक्ति (शिवा) के आदिशक्ति (परमतत्त्व) एवं भगवान् शिवके उनकर अनुगामी बतावल गेलै हे । श्रीमद्भागवतमहापुराणमे अपेक्षाकृत तटस्थ वर्णन है । एकरामे दक्षके स्वायम्भुव मनुके पुत्री प्रसूतिके गर्भसे २४ कन्याके जन्मके बात कहल गेलै हे ।[१] देवीपुराण (महाभागवत) मे १४ कन्याके उल्लेख होलै हे[२] एवं शिवपुराणमे दक्षके ८४ कन्याके उल्लेख होलै हे जेकरामे से २७ के विवाह चन्द्रमासे होलै हल ।[३] ई सब कन्यामे एक सतियो हलथिन । शिवपुराणके अनुसार ब्रह्माजीके भगवान् शिवके विवाहके चिन्ता होलै त ऊ भगवान् विष्णुके स्तुति कैलन आउ विष्णुजी प्रसन्न होके ब्रह्माजीके बतौलन कि यदि भगवान् शिवके विवाह करवावेला हे त देवी शिवाके आराधना करथिन । ऊ बतौलन कि दक्षसे कहथिन कि ऊ भगवती शिवाके तपस्या करथिन आउ उनका प्रसन्न करके अपन पुत्री होवेके वरदान माङ्गथिन । यदि देवी शिवा प्रसन्न हो जैथिन त सब काम सफल हो जैतै ।[४] उनकर कथनानुसार ब्रह्माजी दक्षसे भगवती शिवाके तपस्या करेला कहलन आउ प्रजापति दक्ष देवी शिवाके घोर तपस्या कैलन । उनकर तपस्यासे प्रसन्न होके शिवा उनका वरदान देलन कि हम अपनेके पुत्रीके रूपमे जन्म लेम । हम त सब जन्ममे भगवान् शिवके दासी ही; अतः हम स्वयं भगवान् शिवके तपस्या करके उनका प्रसन्न करबै आउ उनकर पत्नी बनबै । साथे ऊ दक्षसे एहु कहलन कि जखनी अपनेके आदर हमरा प्रति कम हो जैतै तखनी हम अपन शरीरके त्याग देबै, अपन स्वरूपमे लीन हो जैबै अथवा दोसर शरीर धारण कर लेबै । प्रत्येक सर्ग या कल्पला दक्षके ऊ ई वरदान दे देलन ।[५] तदनुसार भगवती शिवा सतीके नामसे दक्षके पुत्रीके रूपमे जन्म ले हथिन आउ घोर तपस्या करके भगवान् शिवके प्रसन्न करऽ हथिन एवं भगवान् शिवसे उनकर विवाह होवऽ है । एकर बादके कथा श्रीमद्भागवतमहापुराणमे वर्णित कथाके बड़ी हद तक अनुरूपे है ।
दक्ष-यज्ञ एवं सतीके आत्मदाह
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]प्रयागमे प्रजापतियके एक यज्ञमे दक्षके पधारे पर सब देवतागण खड़ा होके उनका आदर दे हथिन, किन्तु ब्रह्माजीके साथे शिवोजी बैठले रह जा हथिन ।[६] बुद्धिसे भगवान् शिवके अपन जामाता अर्थात् पुत्र समान मानेके कारण दक्ष उनका खड़ा न होके अपन प्रति आदर प्रकट न करेके कारण अपन अपमान महसूस करऽ हथिम आउ एही कारण ऊ भगवान् शिवके प्रति अनेक कटूक्तिके प्रयोग करैत उनका यज्ञ-भागसे वञ्चित होवेके शाप दे दे हथिन । एकरे बाद दक्ष आउ भगवान् शिवमे मनोमालिन्य उत्पन्न हो गेलै । तत्पश्चात् अपन राजधानी कनखलमे दक्षके द्वारा एक विराट यज्ञके आयोजन कैल गेलै जेकरामे ऊ न त भगवान् शिवके आमन्त्रित कैलन आउ नहिए अपन पुत्री सतीके । सती रोहिणीके चन्द्रमाके साथे विमानसे जाइत देखलन आउ सखीके द्वारा ई पता चले पर कि ऊ लोग उनके पिता दक्षके विराट यज्ञमे भाग लेवे जाइत हथिम, सतियोके मन ओहाँ जाएला व्याकुल हो गेलै । भगवान् शिवके समझावेके बावजूद सतीके व्याकुलता बनल रहलै आउ भगवान् शिव अपन गणके साथे उनका ओहाँ जाएके आज्ञा दे देलन ।[७] किन्तु ओहाँ जाके भगवान् शिवके यज्ञ-भाग न देखके सती घोर आपत्ति जतौलन आउ दक्षके द्वारा अपन (सतीके) आउ उनकर पति भगवान् शिवके प्रतियो घोर अपमानजनक बात कहेके कारण सती योगाग्निसे अपन शरीरके भस्म कर देलन । शिवगणके द्वारा उत्पात मचावल जाए पर भृगु ऋषि दक्षिणाग्निमे आहुति देलन आउ ओकरासे उत्पन्न ऋभु नामक देवता शिवगणके भगा देलन । ई समाचारसे अत्यन्त कुपित भगवान् शिव अपन जटासे वीरभद्रके उत्पन्न कैलन आउ वीरभद्र गण सहित जाके दक्ष-यज्ञके विध्वंस कर देलन; शिवके विरोधी देवता आउ ऋषि सबके यथायोग्य दण्ड देलन एवं दक्षके सिरके काटके हवनकुण्डमे जला देलन । तत्पश्चात् देवता सब सहित ब्रह्माजीके द्वारा स्तुति कैल जाएसे प्रसन्न भगवान् शिव पुनः यज्ञमे होएल क्षतिके पूर्ति कैलन एवं दक्षके सिर जर जाएके कारण बकराके सिर जुड़वाके उनको जीवित कर देलन । फिर उनकर अनुग्रहसे यज्ञ पूर्ण होलै ।[८]
माता सतीके ५१ शक्तिपीठ
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]पौराणिक मान्यताके अनुसार माता सतीके मृत देहके भगवान् शिव अपन कन्धा पर उठा लेलन हल आउ ऊ संसारके भ्रमण करैत ताण्डव करैत हलन । भगवान् विष्णु ब्रह्माजीसे कहलन कि हे! ब्रह्मदेव महादेवके क्रोध तखनी तक शान्त न हो सकै जखनी तक देवी सतीके मृत देह उनकर कन्धा पर है । अतएव हमरा सुदर्शन चक्रसे देवी सतीके शरीरके काटे पड़तै ।" ऐसन कहके भगवान् विष्णु माता सतीके मृत शरीरके ५१ भागमे विभाजित कर देलन । जन्ने जन्ने माता सतीके अङ्ग या आभूषण गिरलै ओहाँ ओहाँ शक्तिपीठ स्थापित हो गेलै । भगवान् शिव जखनी भैरव अवतार लेलन हल तखनी ऊ अन्य ५१ भैरवोके उत्पन्न कैलन आउ हर एक भैरवके शक्तिपीठके रक्षक नियुक्त कर देलन ।
एकरो देखथिन
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]सन्दर्भ
[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]- ↑ श्रीमद्भागवतमहापुराण (सटीक), गीताप्रेस गोरखपुर, ४-१-४७ ।
- ↑ देवीपुराण [महाभागवत]-शक्तिपीठाङ्क (सटीक), गीताप्रेस गोरखपुर, ३-६४ ।
- ↑ श्रीशिवमहापुराण, हिन्दी अनुवाद सहित, गीताप्रेस, गोरखपुर, प्रथम खण्ड, रुद्रसंहिता, द्वितीय (सती) खण्ड, अध्याय-१४, श्लोक-४-६ ।
- ↑ श्रीशिवमहापुराण, हिन्दी अनुवाद सहित, गीताप्रेस, गोरखपुर, प्रथम खण्ड, रुद्रसंहिता, द्वितीय (सती) खण्ड-१०.४२-४५ ।
- ↑ श्रीशिवमहापुराण, हिन्दी अनुवाद सहित, गीताप्रेस, गोरखपुर, प्रथम खण्ड, रुद्रसंहिता, द्वितीय (सती) खण्ड-१२.२५-३५ ।
- ↑ श्रीशिवमहापुराण, हिन्दी अनुवाद सहित, गीताप्रेस, गोरखपुर, प्रथम खण्ड, रुद्रसंहिता, द्वितीय (सती) खण्ड-२६.१०-११ ।
- ↑ श्रीशिवमहापुराण, हिन्दी अनुवाद सहित, गीताप्रेस, गोरखपुर, प्रथम खण्ड, रुद्रसंहिता, द्वितीय (सती) खण्ड-२८.३२-३८ ।
- ↑ (क)श्रीशिवमहापुराण, हिन्दी अनुवाद सहित, गीताप्रेस, गोरखपुर, प्रथम खण्ड, रुद्रसंहिता, द्वितीय (सती) खण्ड, अध्याय-२९ से ४३; (ख)श्रीमद्भागवतमहापुराण (सटीक), गीताप्रेस गोरखपुर, स्कन्ध-४, अध्याय-४ से ७ ।