सामग्री पर जैथिन

हिन्दु दर्शन

विकिपीडिया से

हिन्दुधर्ममे दर्शन अत्यन्त प्राचीन परम्परा रहलै हे । वैदिक दर्शनमे षड्दर्शन (छौ दर्शन) अधिक प्रसिद्ध आउ प्राचीन है । ई साङ्ख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा आउ वेदान्त के नामसे विदित है । इनकर प्रणेता कपिल, पतञ्जलि, गौतम, कणाद, जैमिनि आउ बादरायण हलन । इनकर आरम्भिक सङ्केत उपनिषदोमे मिलऽहै । प्रत्येक दर्शनके आधारग्रन्थ एक दर्शनसूत्र है । "सूत्र" भारतीय दर्शनके एक अद्भुत शैली है । गिनल-चुनल शब्दमे सिद्धान्तके सारके सङ्केत सूत्रमे रहऽहै । सङ्क्षिप्त होवेके कारण सूत्र पर विस्तृत भाष्य आउ अनेक टीकाके रचना होलै । भारतीय दर्शनके ई शैली स्वतन्त्र दर्शनग्रन्थके पश्चिमी शैलीसे भिन्न है । गुरु-शिष्य-परम्पराके अनुकूल दर्शनके शिक्षा आउ रचना एकर आधार है । ई परम्परा षड्दर्शनके बाद नवीन दर्शनके उदयमे बाधक रहलै । व्याख्याके प्रसङ्गमे कुछ नवीनता आउ मतभेदके कारण मुख्य दर्शनमे उपभेद अवश्य पैदा हो गेलै ।

प्रमाणविचार, सृष्टिमीमांसा आउ मोक्षसाधना षड्दर्शनके सामान्य विषय है । ई छौ दर्शन कौनो न कौनो रूपमे आत्माके मानऽहै । आत्माके प्राप्तिये मोक्ष है । पुनर्जन्म, आचार, योग आदियोके ई मानऽहै । न्याय, योग आदि कुछ दर्शन ईश्वरमे विश्वास करऽहै । साङ्ख्य आउ मीमांसा दर्शन निरीश्वरवादी है । प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आउ शब्द ई चार प्रमाण सामान्यतः सब दर्शनके मान्य है । मीमांसा मतमे अर्थापत्ति आउ अनुपलब्धि ई दु प्रमाण आउ मानल जा है ।

हिन्दु दर्शनके विहङ्गम दृश्य

[सम्पादित करथिन | स्रोत सम्पादित करथिन]
दार्शनिक सम्प्रदाय साङ्ख्य योग न्याय वैशेषिक मीमांसा पाणिनीय दर्शन अद्वैत विशिष्टाद्वैत द्वैत पाशुपत शैव सिद्धान्त कश्मीरी शैव सम्प्रदाय वीरशैव सम्प्रदाय रसेश्वर
साँचा:Rh | उत्त्पत्ति काल २०० ई पू २रा शताब्दी ई पू २रा शताब्दी ई पू २रा शताब्दी ई पू ३रा शताब्दी ई पू ६ठा शताब्दी ई पू ७मा शताब्दी १०मा शताब्दी १३मा शताब्दी २रा शताब्दी ७मा शताब्दी ८मा शताब्दी ७मा शताब्दी प्रथम शताब्दी
साँचा:Rh | वर्गीकरण द्वैतवाद, अनीश्वरवाद आध्यात्मिक क्रियाकलाप तर्क, वैश्लेषिक दर्शन परमाणुवाद व्याख्या, वाङ्मीमांसा (भाषा दर्शन) एकत्ववाद, अद्वैत सीमित अद्वैतवाद, द्वैतवाद, ईश्वरमीमांसा ईश्वरवाद, आध्यात्मिक पद्धति ईश्वरवादी द्वैतवाद ईश्वरवादी एकत्ववाद, आदर्शवाद ईश्वरवादी शिवाद्वैत एकेश्वरवादी शक्तिविशिष्टाद्वैत कीमिया
साँचा:Rh | दार्शनिक कपिल, ईश्वरकृष्ण, वाचस्पति मिश्र, गुणरत्न, अधिक.. पतञ्जलि, याज्ञवल्क्य, व्यास गौतम, वात्स्यायन, उदयन, जयन्त भट्ट अधिक.. कणाद, प्रशस्तपाद, न्यायकन्दली अधिक... जैमिनी, कुमारिल भट्ट, प्रभाकर अधिक.. पाणिनि, भर्तृहरि, कात्यायन गौडपाद, आदिशङ्कर, मधुसूदन सरस्वती, विद्यारण्य अधिक.. यमुनाचार्य, रामानुज अधिक.. माध्वाचार्य, जयतीर्थ, व्यासतीर्थ, राघवेन्द्र स्वामी हरदत्ताचार्य, लकूलिष सद्यज्योति, मेयकन्दर, अघोरशिव वसुगुप्त, अभिनव गुप्त, जयरथ रेणुकाचार्य, श्रीपति पण्डिताराध्य, बसवेश्वर गोविन्द भागवत, सर्वज्ञ रामेश्वर
साँचा:Rh | ग्रन्थ साङ्ख्यसूत्र, साङ्ख्यकारिका, साङ्ख्यतत्वकौमुदी अधिक.. योगसूत्र, योग याज्ञवल्क्य, साङ्ख्य प्रवचन भाष्य न्यायसूत्र, न्यायभाष्य, न्यायवार्त्तिक, अधिक.. वैशेषिकसूत्र, पदार्थधर्मसङ्ग्रह, दशपदार्थशास्त्र, अधिक... पूर्वमीमांसासूत्र, मीमांसासूत्र भाष्यम्, अधिक.. वाक्यपदीय, महाभाष्य, वार्त्तिककार प्रस्थानत्रयी, अवधूत गीता, अष्टावक्र गीता, पञ्चदशी अधिक.. सिद्धित्रयम्, श्रीभाष्य, वेदार्थसङ्ग्रह सर्वशास्त्रार्थसङ्ग्रह, तत्त्वप्रकाशिका गणकारिका, पञ्चार्थभाष्यदीपिका, राशिकरभाष्य शैव आगम, श्रीमत किरण, रौरवतन्त्र, मृगेन्द्र शिवसूत्र ([[वसुगुप्त), तन्त्रलोक माहेश्वरसूत्र, श्रीकर भाष्य, सिद्धान्त शिखामणि रसार्णव, रसहृदय, रसेश्वर सिद्धान्त
साँचा:Rh | प्रस्तुत सिद्धान्त पुरुष, प्रकृति, गुण, सत्कार्यवाद यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, अन्यथाक्यटि वाद, निःश्रेयस् अधिक.. पदार्थ, द्रव्य, सामान्य, विशेष, समवाय, परमाणु अपौरुषेयत्व, अर्थापत्ति, अनुपलब्धि, सतहप्रामाण्यवाद स्फोट, अष्टाध्यायी महावाक्य, साधन चतुष्ठय, तीन सत्य : परमार्थिक, व्यावहारिक, प्रतिभासिक हित, अन्तर्व्यापी, बहुव्यापी, अधिक.. प्रपञ्च, मुक्तियोग, नित्यसंसारी, तमोयोग पाशुपति, पाशुपत चर्या, मन्त्रमार्ग, रोधशक्ति चिति, मल, उपाय, अनुत्तर, अहम्, स्वातंत्र्य एकोत्तर षटस्थल शून्यसम्पदान पारद, पारदके तीन रूप
साँचा:Rh | पुनर्विकास राजयोगमे मिल गेलै भक्तियोग, हठयोग नव्यन्याय न्याय साथे मिल गेलै । वेदान्त द्वारा धराशायी होलै शास्त्रीय संस्कृत शुद्धाद्वैत स्वामिनारायण सम्प्रदाय वैष्णव सम्प्रदाय शैव भक्ति गुरु , लिङ्ग, जङ्गम, षटस्थल सिद्धान्त रसायन

उपनिषन्मूलक होवेके कारण एकरामे वेदान्त दर्शन सबसे अधिक प्राचीन है । किन्तु ब्रह्मसूत्रमे अन्य दर्शनके खण्डन है एवं ओकर प्राचीनतम भाष्य आदि शङ्कराचार्यके है (५०७ ई पू) । अन्य दर्शन सूत्रके भाष्य ईसाके आरम्भिक शताब्दीमे रचल गेलै । साङ्ख्यसूत्र सम्भवतः लुप्त हो गेलै । ईश्वरकृष्ण (५मा शताब्दी) के "साङ्ख्यकारिका" साङ्ख्य दर्शन के प्रामाणिक ग्रन्थ है । साङ्ख्य दर्शन निरीश्वरवादी द्वैतवाद है । एकरा अनुसार प्रकृति आउ पुरुष दु स्वतन्त्र आउ सनातन सत्ता है । "प्रकृति" जड़ है आउ जगत् के सूक्ष्म कारण है । ऊ सत्व, रजस् आउ तमस् ई तीन गुणके साम्यावस्थाके नाम प्रकृति है । प्रकृतिके साथे पुरुषके सम्पर्क होवेसे सर्गके आरम्भ होवऽहै । सर्ग पुरुषके बन्धन है । तत्वज्ञानसे मोक्ष होवऽहै । अपन शुद्ध चेतन कर्तृत्व भोक्तृत्व रहित स्वरूपके ज्ञानसे पुरुष मुक्त होवऽहै ।

योग दर्शन के सिद्धान्त साङ्ख्यके समान है । योगसूत्र पर रचित भाष्य आउ टीका योगदर्शनके विस्तृत परम्पराके आधार है । योगदर्शनके मुख्य लक्ष्य समाधिके मार्गके प्रशस्त कैल है । समाधिमे चित्तके समस्त वृत्तिके निरोध हो जा है । अभ्यास, वैराग्य आउ ध्यान योगके मुख्य साधन है । ईश्वरोके ध्यानके लक्ष्य बनावल जा सकऽहै एत्ते योगदर्शनमे ईश्वरके महत्व है । यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान आउ समाधिके आठ अङ्गसे युक्त अष्टाङ्गयोग योगके सर्वजन सुलभ मार्ग है ।

न्याय एक प्रकारके भारतीय तर्कशास्त्र है । न्यायसूत्र पर अनेक प्रसिद्ध टीका है । गङ्गेश उपाध्याय (१२मा शताब्दी) के "तत्वचिन्तामणि" से नवद्वीपमे नव्य न्यायके परम्पराके आरम्भ होलै । न्यायदर्शनके पहिलेहीँ सूत्रमे १६ पदार्थ के उल्लेख है । इनकर द्वारा तत्वज्ञान होवऽहै जे निःश्रेयस अथवा मोक्षके साधन है । प्रमाणके विशेष विस्तार न्यायदर्शनमे मिलऽहै । ईश्वरभक्तिके न्यायमे मोक्षके साधन मानल गेलै हे ।

वैशेषिक दर्शन एक प्रकारसे न्यायके समान तन्त्र है । न्याय आउ वैशेषिक दुनो प्रमाणप्रधान दर्शन है । 'विशेष' अथवा 'परमाणु' ओकर मुख्य विषय है । परमाणु, सृष्टिके मूल उपादान कारण है । न्याय-वैशेषिक-दशर्न ईश्वरके सृष्टिके निमित्त कारण मानल जा है । वैशेषिक दर्शनमे सम्पूर्ण सत्ताके सात पदार्थमे विभाजित कैल गेलै हे - द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय आउ अभाव । न्यायके १६ पदार्थके अपेक्षा अधिक सङ्गत होवेके कारण एही विभाजन आगे चलके अधिक मान्य होलै एवं न्याय-वैशेषिक-दर्शनके ऊ संयुक्त परम्पराके आधार बनलै, जेकर प्रतिनिधित्व न्यायमुक्तावली आदि अर्वाचीन ग्रन्थ कर है ।

षड्दर्शनमे अन्तिम दु दर्शनके "मीमांसा" कहल जा है । ई पूर्वमींमांसा आउ उत्तरमीमांसा कहला है । अन्य दर्शनके अपेक्षा इनकर वेदसे अधिक घनिष्ठ सम्बन्ध है । एक प्रकारसे ई वैदिक दर्शनके व्याख्या है । पूर्वमीमांसा, मन्त्रसंहिता आउ ब्राह्मणके कर्मकाण्डके व्याख्या है ।

उत्तरमीमांसा उपनिषद् के अध्यात्मदर्शनके तार्किक विवेचन है । वेदके अन्तिम भाग होवेके कारण उपनिषद् के "वेदान्त" कहला है । उत्तर मीमांसाके नामो "वेदान्त" है । ई सब दुनो मीमांसाके सिद्धान्तके आधार वेदमे है, किन्तु व्यवस्थित दर्शनके रूपमे इनकर आरन्भ अन्य दर्शनके साथे साथे (प्रथम शताब्दीमे) होलै । एहीसे इनकर गणना षड्दर्शनमे कैल जा है । दुनो मीमांसाके इतिहासके तीन चरण है । तीनोए चरणमे इनकर विकास एके पूर्वोत्तर क्रममे होलै । वैदिक युगमे वेदके पूर्वभाग (संहिता, ब्राह्मण) मे कर्मकाण्डके विधान होलै । वेदके उत्तर भाग (उपनिषद्) मे अध्यात्मके प्रतिष्ठा होलै । ईसाके आरम्भिक शताब्दीमे जैमिनि आउ बादरायणके "मीमांसासूत्र" एवं "ब्रह्मसूत्रो" सम्भवतः एही क्रममे रचल गेलै । ईसा पूर्वके छठा शताब्दीमे कुमारिल भट्ट आउ शङ्कराचार्य एही पूर्वापर क्रममे पूर्व आउ उत्तरमीमांसाके उद्धार एवं प्रचार कैलन ।

अनात्मवादी होवेके कारण बौद्ध दर्शन के आत्मवादी वैदिक दर्शनसे विरोध है । वैदिकधर्मके विरुद्ध क्रान्तिके रूपेमे ईसवी पूर्व छठा शताब्दीमे बौद्धधर्मके उदय होलै हल । अनेक कारणसे ईसाके छठा शताब्दीमे बौद्धधर्मके ह्रास होवे लगलै । कुमारिल आउ शङ्कराचार्य वैदिक धर्मके दुनो पक्षके प्रतिष्ठा कैलन । इनकर बाद पार्थसारथि मिश्र (१४मा शताब्दी) एवं माधवचार्य (१४मा शताब्दी) पूर्वमीमांसा दर्शनके विस्तार कैलन । माधवाचार्य विजयनगरके राजा वुक्काके मन्त्री हलन । बादमे सन्यास लेके विद्यारण्यके नामसे शृङ्गेरी पीठके शङ्कराचार्य पद पर आसीन होलन आउ "पञ्चदशी" नामक प्रद्धि वेदान्त ग्रन्थके रचना कैलन । वेदान्तमतके प्रतिष्ठाला शङ्कराचार्य देशके चारो कोना पर जौन चार पीठके स्थापना कैलन ओकरामे शृङ्गेरी पीठ दक्षिणमे नीलगिरि पर्वत पर स्थित है । अन्य तीन पीठ पुरी, बदरिकाश्रम आउ द्वारकामे है । शङ्कराचार्य उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र आउ गीता पर भाष्यके रचना कैलन । शङ्कराचार्यके बाद वाचस्पति मिश्र (९मा शताब्दी), श्रीहर्ष (१२मा शताब्दी) आदि आचार्य वेदान्त परम्पराके विस्तार कैलन ।